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24 Oct, 2018 Blog

Is Upay Se Hogi Lakshmi Maa Ki Kripa / इस उपाय से होगी लक्ष्मी मा की कृपा

https://youtu.be/CP-KsdopN4I

इस उपाय से होगी लक्ष्मी मा की कृपा

दीपावली की पूजा सामान्य जन में सुख -समृद्धि और धन के लिए होती है ।सभी पूजा करके सीधे धन चाहते हैं ,सभी चाहते हैं लक्ष्मी उनके घर आ जाएं और बैठ जाएं ।दुनियाभर के सुख और समृद्धि उन्हें मिल जाए ।इसके लिए दीपावली पर गणेश लक्ष्मी लाकर पूजा करते हैं ।परिणाम कुछ संदिग्ध होता है ,जिसको आने वाले साल कुछ लाभ हुआ वह गणेश ,लक्ष्मी की कृपा मान लिया ,जिसे नहीं हुआ अपने भाग्य को दोष दे लिया कि  जब भाग्य में ही नहीं तो लक्ष्मी गणेश कहां से दे देंगे ।

लक्ष्मी मां मिलने के कारण

कभी कभी लम्बे अनुष्ठान और यहां तक की साधना का भी कोई परिणाम नहीं मिलता ।इसमें एक कारण तो यह है कि कुछ भी कर लो मिलेगा उतना ही जितना भाग्य में होगा ।दूसरा कारण यह की भाग्य का भी पूरा किसी को नहीं मिलता ।सब कोशिश धन के लिए करते हैं जबकि मिलता भाग्य जितना भी नहीं क्योंकि भाग्य ही धन को रोका जाता है ।नकारात्मक शक्तियों द्वारा ,फिर कितने भी उपाय करो धन के लिए नहीं मिलेगा।तीसरा कारण होता है की सभी सीधे लक्ष्मी को ही बुलाते हैं कोई उनके आने का मार्ग नहीं प्रशस्त करने पर ध्यान देता है |इनके आने में ही बाधा होती है और अगर नकारात्मक ऊर्जा या शक्ति आपके आसपास है तो आ रही लक्ष्मी भी लौट जाती है |

लक्ष्मी पाने के उपाय 

सबसे पहले उपाय नकारात्मक शक्तियों के लिए उपाय करें ताकि भाग्य का पूरा मिले।लक्ष्मी के पीछे भागने का कोई फायदा नहीं वो आएगी तब ना जब ये नकारात्मक शक्तियां आने देंगी और रुकावट नहीं बनेंगी ।उनका मार्ग साफ़ करना जरूरी है जिससे आपके भाग्य में उनकी जितनी मात्रा है वह आ सके ।रास्ता दीजिए वह तो खुद आ जायेगी ,सीधे बुलाइये नहीं उन्हें लाने का प्रयास कीजिए ।पूजने से वह नहीं आएगी प्रयास करने और रास्ता बनाने से वह आएगी ।
बिन नकारात्मक प्रभाव हटाए लक्ष्मी नहीं आ सकती क्योंकि लक्ष्मी एक सात्विक शक्ति हैं जो नकारात्मकता नहीं हटाती ,यह तब आती हैं जब कोई अवरोध न हो।आप नकारात्मकता से घिरे हैं ,मन मलिन है ,स्वास्थ्य सही नहीं है ,शारीरिक असंतुलन है ,विचार सही नहीं अथवा एकाग्र नहीं ,प्रयास कोई भी पूरा नहीं कर पाते ,कोई कार्य ठीक से नहीं होता।घर में कलह है ,न ठीक से निर्णय कर पाते हैं न प्रयास ,हर कार्य में अड़चन आ जाती है ,बनते काम बिगड़ जाते हैं । अब न आपका प्रयास सही होगा और न लक्ष्मी को साफ़ रास्ता ही मिलेगा |
इसलिए उपाय जरूर कीजिये पर अंधेरे को ,नकारात्मकता को ,बाधाओं को हटाने  ,रास्ता साफ कीजिये लक्ष्मी के आने का।
भयानक अंधेरी रात को दीपक से खुद के लिए राह करने का पर्व है दीपावली ।जगमग तो तब होगा जब कर्म करके ,नकारात्मकता हटाके इसे प्रकाशित करेंगे। कोशिश कीजिए अपने अंदर और घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का ।लक्ष्मी आपके भाग्यानुसार खुद आ जायेगी ।

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24 Oct, 2018 Blog

Diwali Pujan Ke Subh Lagn Aur Mahurat / दीपावली पूजन के शुभ लग्न और मुहूर्त

https://youtu.be/C1J4U55hm9k

दीपावली पूजन के शुभ  लग्न और मुहूर्त

श्री  गणेश लक्ष्मीन्द्र प्रभु ,रिद्धि-सिद्धि दातार।
आन विराजो काज मह, कर दो मम उद्धार।।

7 नवंबर 2018 कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या बुधवार में श्री महालक्ष्मी जी की पूजन (दीपावली) माननीय रहेगा । इस महापर्व का सूक्ष्म गणित अनुसार इस वर्ष अमावस्या तिथि रात्रि 9:31 तक रहेगी। लक्ष्मी पूजन के लिए अति उत्तम मानी जाएगी । स्वाति नक्षत्र सायं 7:36 तक रहेगा आयुष्मान योग सायं 5:57 तक उसके बाद सौभाग्य योग बनेगा । बुधवार में स्वाति नक्षत्र का संयोग होने से धूम्रयोग बनता है जो इस पूजन के लिए मध्यम रहेगा। स्वाति नक्षत्र चर चल सज्ञक होने के कारण उद्योगधंधे, दुकानदार, व्यापारियों के लिए श्रेष्ठ है । दीपावली लक्ष्मी जी की उत्पत्ति होने से सभी तरह के कामना पूर्ति अत्यंत शुभ मानी गई है।

दीपावली पूजन दिन में कुछ लग्न मुहूर्त का विचार

दीपावली कि दिन में 7 नवंबर को कुछ लग्न विचार आवश्यक है । कुछ व्यापारी अपने उद्योग धंधे व्यवसाय प्रतिष्ठान आदि में लक्ष्मी पूजन के लिए धनु लग्न  को श्रेष्ठ मानते हैं धनु लग्न का स्वामी बृहस्पति है बृहस्पति सबकी सफलता में सहायक रहता है । परंतु धनु लग्न दीपावली दिन बुधवार में 9:37 पर शुरू होगी और 9:20 के बाद लाभ तथा अमृत की दो चौघड़िया मुहूर्त भी संयोग शुभ फलदायक रहेंगे। अतः धनु लग्न और लाभ +अमृत की चौघड़िया श्रेष्ठकर है। धनु लग्न में शनि बढ़ोत्तरी में सहायक बनेगा। किसी भी धंधेवाले अपने प्रतिष्ठान में धनु लग्न पर पूजन करा सकते हैं । इसी लग्न को स्वीकार कर लेना व्यापारी के लिए उत्तम है।
मकर लग्न 11:41 में शुरू होगी किंतु मकर लग्न में केतु का संयोग  और काल की चौघड़िया के कारण मुहूर्त श्रेष्ठ नहीं है ।11:40 से 12:20 तक अभिजीत मुहूर्त आता है परंतु बुधवार युक्त अभिजीत मुहूर्त श्रेष्ठ नहीं मानी जाती है ।अतः मकर लग्न में लक्ष्मी पूजन ना किया जाए  तो सही है ।
कुंभ लगना दीपावली के दिन बुधवार में 13:25 से 14:54 बजे तक मध्य में रहेगी दिन में 13:25 से 14:00 47 बजे तक उद्वेग का चौघड़िया मुहूर्त रहेगा जिसके स्वामी रवि श्रेष्ठ फल दायक है ।लग्न अपने स्वामी से दुष्टों होने के कारण बलवान कही जाएगी अतः श्री गणेश लक्ष्मी त्रिदेव परम शक्ति नवग्रह कुबेर रिद्धि सिद्धि सहित बही खाता कलमदान पूजन करने तथा  करानेवालों के लिए लाभप्रद रहेंगे।
मीन लग्न बुधवार में 14:55 से 16:22 तक रहेगी इसी लग्न में श्रेष्ठ मुहूर्त चर का चौघड़िया 16:08 तक रहेगा  ।उपरांत लाभ का चौघड़िया प्रारंभ हो जाएगा ।श्रेष्ठ लग्न मुहूर्त में आप अपने व्यवसाय उद्योग संबंधी पूजा अर्चन करा कर लाभ की भागीदारी बन सकते हैं। लग्न अपने स्वामी से दुष्ट है भाग्य स्थान में सुखेश तथा बुध की स्थिति इस साल मध्य   पर्यंत पर्याप्त उन्नति के भागीदार बनेंगे। मेष  लग्न लक्ष्मी पूजन  के दिन सायं काल 16:21 से 17: 57 मिनट तक रहेगी मेष लग्न सूर्य शुक्र चंद्र से प्रभावित है। और तत्काल लग्नेश भोम का लाभ स्थान में बली हो कर बैठना अत्यंत सुख दायक है। इसी लग्न  में  गोधूलि का संयोग हो रहा है। प्रदोष के उत्तम समय का समागम असफलता के मध्य में सफलतादायक  कहा गया है। धेनु वेला लगन सकल सुमंगल मूल अर्थात प्रदोष बेला के साथ साथ गोधूलि का संयोग अत्यंत शुभ मंगल है। इसी समय में सभी व्यापारी गण अपने प्रतिष्ठान में गणेश लक्ष्मी रिद्धि सिद्धि कुबेर आदि सभी देवताओं का पूजा अर्चन कराएं और बहीखाता कलमदान रोकड़ा पूजन आधुनिक उपकरण तथा मशीनरी से संबंधित पूजन विधि यही समय श्रेष्ठ है। पूजन के बाद अपने कर्मचारियों को भेंट आदि भी देना यह समय अत्यंत लाभप्रद है। यह थी दिन की दीपावली पूजन का मुहूर्त ।

दीपावली पूजन और रात्रि के लग्न विचार

वृष लग्न   दीपावली के दिन 7 नवंबर 2018 को रात्रि मुहूर्त काल में सायं 17:58 बजे प्रदोष के समय शुरू होकर 19:55 बजे तक रहेगी। वृष लग्न पर बुध और बृहस्पति की सप्तम दृष्टि तथा मंगल की चौथी दृष्टि के कारण  भौतिक विकास में सहायक मानी जाती है। रात्रि बेला में उद्वेग, शुभ, अमृत और चर के चौघड़िया मुहूर्त 24:30 तक शुभ फलदायक रहेंगे । प्रदोष के समय में उद्वेग के चौघड़िया की व्याप्ति मनोकामना पूर्ति में सहायक बनेगी। लक्ष्मी पूजन के लिए प्रदोष काल को पूर्व आचार्य ने श्रेष्ठ माना है ।अतः प्रदोष में दीपावली का पूजन करना श्रेष्ठ है । प्रदोष के अधिपति आशुतोष भगवान शंकर जी सभी की समृद्धि प्रदान करेंगे
मिथुन लग्न दीपावली की रात्रि बेला में 19:55 प्रारंभ होकर 22:10 तक समाप्त होगी इस समय शुभ और अमृत के दो चौघड़िया मुहूर्त  व्यतीत होंगे जो कि सभी तरह के व्यापार करने वालों के लिए शुभ फल रहेगा। लग्न पर शनि का सीधा प्रभाव है जो उद्योग संचालन को सहायक कहा जाता है । इसी समय में किसी अच्छे आचार्य द्वारा महालक्ष्मी का पूजन करें
कर्क लग्न दीपावली की रात्रि में 22:10 से 24:27 तक रहेगी निशीथ काल में कर्क लग्न अत्यंत सुखद मानी जाती है । शुभ समय में पूजन करने वाले तथा कराने वालों को लाभप्रद होता है। इस वर्ष 23:44से निशीथ काल आ जाएगा निशीथ काल में विशेष पूजन किया जाता है निशीथ काल में समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी जी के प्रादुर्भाव हुआ था। इसलिए इसी समय को सभी वेद आचार्य ने श्रेष्ठ माने हैं ।इसी समय में महालक्ष्मी पूजन अवश्य ही करना चाहिए श्री सूक्त द्वारा षोडशोपचार पूजन करके लक्ष्मी जी को अनेक द्रव्य का समर्पण करेंगे और मूर्ति तथा यंत्र में लक्ष्मी की श्री बीज मंत्र प्रयोग करके श्री महालक्ष्मी जी की विशेष कृपा फल प्राप्त कर सकते हैं। इसी समय में सभी तंत्र क्रिया भी किए जाते हैं सभी यंत्र का सिद्धि करने का मुहूर्त भी है और श्री प्राप्ति हेतु श्री सूक्त का 108 बार पाठ किया जाता है ।

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23 Oct, 2018 Blog

Apke Ghar Bhi Hai Laddu Gopal To Jarur Kare Ye Kaam / आपके घर भी हैं लड्डू गोपाल तो जरूर करें ये काम

https://youtu.be/LfDKiWI3S54

आपके घर भी हैं लड्डू गोपाल तो जरूर करें ये काम

आपके घर में लड्डू गोपाल जी हैं तो आप इस बातों का विशेष ध्यान रखें

  • प्रथम तो ये कि जिस भी घर में लड्डू गोपाल जी का प्रवेश हो जाता है वह घर लड्डू गोपाल जी का हो जाता है, इसलिए मेरा घर का भाव मन से समाप्त होना चाहिए अब वह लड्डू गोपाल जी का घर है।
  • दूसरी विशेष बात यह कि लड्डू गोपाल जी अब आपके परिवार के सदस्य है, सत्य तो यह है कि अब आपका परिवार लड्डू गोपाल जी का परिवार है।अतः लड्डू गोपाल जी को परिवार के एक सम्मानित सदस्य का स्थान प्रदान किया जाए।
  • परिवार के सदस्य की आवश्यक्ताओं के अनुसार ही लड्डू गोपाल जी की हर एक आवश्यकता का ध्यान रखा जाए।
  • एक विशेष बात यह कि लड्डू गोपाल जी किसी विशेष ताम झाम के नहीं आपके प्रेम और आपके भाव के भूखे हैं, अतः उनको जितना प्रेम जितना भाव अर्पित किया जाता है वह उतने आपके अपने होते हैं।
  • प्रति दिन प्रातः लड्डू जी को स्नान अवश्य कराएं, किन्तु स्नान कराने के लिए इस बात का विशेष ध्यान रखे कि जिस प्रकार घर का कोई सदस्य सर्दी में गर्म पानी व गर्मी में ठन्डे पानी से स्नान करता है, उसी प्रकार से लड्डू गोपाल जी के स्नान के लिए मौसम के अनुसार पानी का चयन करें, स्नान के बाद प्रति दिन धुले स्वच्छ वस्त्र पहनाएं।
  • जिस प्रकार आपको भूख लगती है उसी प्रकार लड्डू गोपाल जी को भी भूख लगती है अतः उनके भोजन का ध्यान रखें,  भोजन के अतिरिक्त, सुबह का नाश्ता और शाम के चाय नाश्ते आदि का भी ध्यान रखें।
  • घर में कोई भी खाने की वस्तु आए लड्डू गोपाल जी को हिस्सा भी उसमें अवश्य होना चाहिए।
  • प्रत्येक मौसम के अनुसार लड्डू गोपाल जी के लिए सर्दी गर्मी से बचाव का प्रबन्ध करना चाहिए, मौसम के अनुसार ही वस्त्र पहनाने चाहिए।
  • लड्डू गोपाल जी को खिलौने बहुत प्रिय हैं उनके लिए खिलौने अवश्य लेकर आएं और उनके साथ खेलें भी।
  • समय समय पर लड्डू गोपाल जी को बाहर घुमाने भी अवश्य लेकर जाएं।
  • लड्डू गोपाल जी से कोई ना कोई नाता अवश्य कायम करें, चाहें वह भाई, पुत्र, मित्र, गुरु आदि कोई भी क्यों ना हो, जो भी नाता लड्डू गोपाल जी से बनायें उसको प्रेम और निष्ठा से निभाएं।
  • अपने लड्डू गोपाल जी को कोई प्यारा सा नाम अवश्य दें।
  • लड्डू गोपाल से प्रेम पूर्वक बाते करें, उनके साथ खेलें, जिस प्रकार घर के सदस्य को भोजन कराते हैं उसी प्रकार उनको भी प्रेम से भोजन कराएं।पहले लड्डू गोपाल को भोजन कराएँ उसके बाद स्वयं भोजन करें।
  • प्रतिदिन रात्री में लड्डू गोपाल जी को शयन अवश्य कराएं, जिस प्रकार एक छोटे बालक को प्रेम से सुलाते हैं उसी प्रकार से उनको भी सुलायें, थपथाएँ, लोरी सुनाएँ।
  • प्रतिदिन प्रातः प्रेम पूर्वक पुकार कर उनको जगाएं।
  • किसी भी घर में प्रवेश के साथ ही लड्डू गोपाल जी में प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है इसलिए उनको मात्र प्रतीमा ना समझ कर घर के एक सदस्य के रूप में ही उनके साथ व्यवहार करें।
  • यूं तो प्रत्येक जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल जी की पूजा धूम-धाम से होती है, किन्तु यदि आपको वह तिथि पता है जिस दिन लड्डू गोपाल जी ने घर में प्रवेश किया तो उस तिथि को लड्डू गोपाल जी के जन्म दिन के रूप में मान कर प्रति वर्ष उस तिथि में उनका जन्म दिन अवश्य मनाएं , बच्चों को घर बुला कर उनके साथ लड्डू जी का जन्म दिन मनायें और बच्चों को खिलौने वितरित करें।
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23 Oct, 2018 Blog

Rahu Ketu Shani Ke Dushprabhav Se Mukti Dilayenge Yha Upay / राहु केतु शनि के दुष्प्रभाव से मुक्ति दिलाएंगे यह उपाय

https://youtu.be/4gpcdrKctA0

राहु केतु शनि के दुष्प्रभाव से मुक्ति दिलाएंगे यह उपाय

राहु की मार :

यदि व्यक्ति अपने शरीर के अंदर किसी भी प्रकार की गंदगी पाले रखता है तो उसके ऊपर काली छाया मंडराने लगती है अर्थात राहु के फेर में व्यक्ति के साथ अचानक होने वाली घटनाएँ बढ़ जाती है। घटना-दुर्घटनाएँ, होनी-अनहोनी और कल्पना-विचार की जगह भय और कुविचार जगह बना लेते हैं। राहु के फेर में आया व्यक्ति बेईमान या धोखेबाज होगा। राहु ऐसेव्यक्ति की तरक्की रोक देता है। राहु का खराब होना अर्थात् दिमाग की खराबियाँ होंगी, व्यर्थ के दुश्मन पैदा होंगे, सिर में चोट लग सकती है। व्यक्ति मद्यपान या संभोग में ज्यादा रत रह सकता है। राहु के खराब होने से गुरु भी साथ छोड़ देता है। राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक,वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छे होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या
प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

केतु की मार :

जो व्यक्ति जुबान और दिल से गंदा है और रात होते ही जो रंग बदल देता है वह केतु का  शिकार बन जाता है। यदि व्यक्ति किसी के साथ धोखा, फरेब, अत्याचार करता है तो केतु उसके पैरों से ऊपर चढ़ने लगता है और ऐसे व्यक्ति के जीवन की सारी गतिविधियाँ रुकने लगती है। नौकरी, धंधा, खाना और पीना सभी बंद होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सड़क पर या जेल में सोता है घर पर नहीं। उसकी रात की नींद हराम रहती है, लेकिन दिन में सोकर वह सभी जीवन समर्थक कार्यों से दूर होता जाता है। केतु के खराब होने से व्यक्ति पेशाब की बीमारी, जोड़ों का दर्द, सन्तान उत्पति में रुकावट और गृहकलह से ग्रस्त रहता है। केतु के अच्छा होने से व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख उठाता है और रात की नींद चैन से सोता है।

शनि की मार

पराई स्त्री के साथ रहना, शराब पीना, माँस खाना, झूठ बोलना, धर्म की बुराई करना या मजाक उड़ाना, पिता व पूर्वजों का अपमान करना और ब्याज का धंधा करना प्रमुख रूप से यह सात कार्य शनि को पसंद नहीं। उक्त में से जो व्यक्ति कोई-सा भी कार्य करता है शनि उसके कार्यकाल में उसके जीवन से शांति, सुख और समृद्धि
 छिन लेता है। व्यक्ति बुराइयों के रास्ते पर चलकर खुद बर्बाद हो जाता है। शनि उस सर्प की तरह है जिसके काटने पर व्यक्ति की मृत्यु तय है। शनि के अशुभ प्रभाव के कारण मकान या मकान का हिस्सा गिर
जाता है या क्षतिग्रस्त हो जाता है, नहीं तो कर्ज या लड़ाई-झगड़े के कारण मकान बिक जाता है। अंगों के बाल तेजी से झड़ जाते हैं। अचानक आग लग सकती है। धन, संपत्ति का किसी भी तरह नाश होता है। समय पूर्व दाँत और आँख की कमजोरी। शनि की स्थिति यदि शुभ है तो व्यक्ति हर क्षेत्र में प्रगति करता है। उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। बाल और नाखून मजबूत होते हैं। ऐसा व्यक्ति न्यायप्रीय होता है और समाज में मान-सम्मान खूब रहता हैं।
बचाव का तरीका :

शनि के उपाय-

सर्वप्रथम भैरवजी के मंदिर जाकरउनसे
अपने पापों की क्षमा माँगे। जुआ, सट्टा, शराब,वैश्या से संपर्क, धर्म की बुराई, पिता-पूर्वजों का अपमान और ब्याज आदि कार्यों से दूर रहें। शरीर के सभी छिद्रों को प्रतिदिन अच्छे से साफ रखें। दाँत,बाल और नाखूनों की सफाई रखें। कौवे को प्रतिदिन रोटी खिलाएँ। छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि
मंदिर में रख आएँ। अंधे, अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार रखें। रात को सिरहाने पानी रखें और उसे सुबह कीकर,
आँक या खजूर के वृक्ष पर चढ़ा आएँ।

राहु के उपाय-

सिर पर चोटी रख सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर। भोजन भोजनकक्ष में ही करें। ससुराल पक्ष से अच्छे संबंध रखें।
रात को सिरहाने मूली रखें और उसे सुबह किसी मंदिर में दान कर दें।
केतु के उपाय- संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध अच्छे रखें भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ। कुत्ता भी पाल सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के
विशेषज्ञ से पूछकर।
राहु-केतु और शनि को प्रसन्न करने के खास उपाय शनि को प्रसन्न करने के लिए बताए गए खास उपायों में से एक उपाय है, किसी कुत्ते को तेल चुपड़ी हुई रोटी खिलाना। अधिकतर लोग प्रतिदिन कुत्ते को रोटी तो खिलाते ही हैं ऐसे में यदि रोटी पर तेल लगाकर कुत्ते को खिलाई जाए तो शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है।
कुत्ता शनिदेव का वाहन है और जो लोग कुत्ते को खाना खिलाते हैं उनसे शनि अति प्रसन्न होते हैं। शनि महाराज की प्रसन्नता के बाद व्यक्ति को
परेशानियों के कष्ट से मुक्ति मिल जाती है।
साढ़ेसाती हो या ढैय्या या कुंडली का अन्य कोई दोष इस उपाय से निश्चित ही लाभ होता है।
कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाने से शनि के साथ
ही राहु-केतु से संबंधित दोषों का भी निवारण हो
जाता है। राहु-केतु के योग कालसर्प योग से पीड़ित
व्यक्तियों को यह उपाय लाभ पहुंचाता है। इसके
अलावा निम्न मंत्रों से भी पीड़ित जातकों को
अत्यंत फायदा पहुंचता है।
राहु मंत्र को अगर सिद्ध किया जाए तो राहु से
जुड़ी परेशानियां समाप्त होती हैं। ध्यान रहे कि
राहु मंत्र की माला का जाप 8 बार किया जाता
है।

राहु मंत्र-

ह्रीं अर्धकायं महावीर्य चंद्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ संभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:।
ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहु
प्रचोदयात्।

केतु मंत्र-

केतु मंत्र का जाप 8 बार किया जाता है।

ॐ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम।।
ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:।
ॐ पद्मपुत्राय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु:
प्रचोदयात्।।

 

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23 Oct, 2018 Blog

Kundali Ke Pancham Bhav Se Jane Kab Hogi Santaan / कुंडली के पंचम भाव से जानें कब होगी संतान

https://youtu.be/LVrsXpqaxzk

कुंडली के पंचम भाव से जानें कब होगी संतान

पंचम भाव को पूर्व पुण्य स्थान भी कहा जाता है अर्थात वह भाव जो पिछले जन्म में किए गए कर्मों को दर्शाता है। यदि कुंडली में पंचम भाव बली नहीं हो तो कुंडली को बलहीन विचारा जाता है। कुंडली के इसी भाव से संतान सुख का भी विचार किया जाता है किसी भी कुंडली में संतान के विषय में जानने के लिए कुछ बातों का गहराई से  अध्ययन करना चाहिए:-

लग्न लग्नेश,पंचम पंचमेश,नवम नवमेश।

कारक ग्रह बृहस्पति।

एकादश भाव।

सप्तांश कुंडली।

बीज स्फूट एवं क्षेत्र स्फुट।

उचित दशा और ग्रहों का गोचर।

ग्रहः

पंचमेश, पंचम भाव में बैठे ग्रह कारक  बृहस्पति तथा लग्नेश और इन पर पड़ने वाली दृष्टियाँ  संतान के जन्म के लिए उत्तरदायित्व रखने वाले घटक हैं। यदि पंचम भाव, पंचमेश और बृहस्पति बली हो और उन पर शुभ ग्रहों का प्रभाव है और लग्नेश भी बली हो तो संतान सुख अवश्य ही प्राप्त होता है। इसके विपरित यदि पापी ग्रहों का प्रभाव पंचम भाव तथा पंचमेश पर है और बृहस्पति भी पीड़ित हो तो संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होती है।

एकादश भाव में बैठे ग्रह अपनी पूर्ण सातवीं दृष्टि से पंचम भाव पर अपना प्रभाव डालते हैं अगर एकादश भाव में शुभ ग्रह है तो ये पंचम भाव को बल देते हैं और ये ग्रह पापी हैं तो अपनी दृष्टि से पंचम भाव को पीड़ित करते हैं।

 बीज स्फुट एवं क्षेत्र स्फुट :-

किसी भी युगल के संतान जनने की योग्यता और क्षमता को ज्ञात करने के लिए यह वैदिक ज्योतिष का एक अनुपम सिद्धांत है। पुरुष की प्रजनन क्षमता को बीज स्फुट तथा स्त्री की प्रजनन क्षमता को क्षेत्र स्फुट द्वारा ज्ञात किया जाता है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि युगल को किसी चिकित्सा की आवश्यकता होगी कि नहीं।

 सप्तांश कुंडली:-

सप्तांश कुंडली द्वारा संतान सुख का सुक्ष्म निरीक्षण किया जाता है । डी-7 का बली लग्न संतान के जन्म को सुनिश्चित करता है । जन्म कुंडली के लग्नेश को सप्तांश के 6,8,12 भाव में नहीं होना चाहिए क्योंकि यह संतान के साथ संबंध अच्छे नहीं होने देता। सप्तांश के पंचम भाव से पहली तथा सातवें भाव से दूसरी संतान का विचार किया जाता है।

 संतान के जन्म का समय  निर्धारण:-

संतान के जन्म का समय निर्धारण करने में संतान देने की योग्यता रखने वाले ग्रहों की दशा और गोचर का अनुकूल होना महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

दशा:-

जो ग्रह इन भावों या भावेशों से संबंधित होते हैं वो संतान देने की योग्यता रखते हैं:-

 पंचम भाव या पंचमेंश।

नवम भाव या नवमेंश।

लग्न या लग्नेश।

बृहस्पति।

 गोचर:-

संतान के जन्म का निर्धारण करने में ग्रहों का गोचर अपनी अहम भूमिका निभाता हैं। जिसमें बृहस्पति और शनि का गोचर महत्वपूर्ण योगदान देता हैं। गोचर में  बृहस्पति ग्रह और शनि  जब पंचम भाव या पंचमेंश अथवा नवम भाव या नवमेंश को दृष्ट करते है तो संतान का योग बनता हैं।

 संतानहीनता के योग:-

 पंचम भाव में राहु- मंगल की राशि में अथवा मंगल से दृष्ट।

 पंचमेश की राहु से युति।

 राहु लग्न में और बृहस्पति एवं मंगल पंचम भाव में।

 राहु और बुध पंचम भाव में।

 बृहस्पति, लग्नेश, पंचमेश एवं सप्तमेश का निर्बल होना।

 पंचम भाव में शनि, चंद्रमा से दृष्ट।

 इसके अलावा पूर्व जन्म के श्राप भी जैसे सर्पश्राप, मातृश्राप, पितृशाप आदि भी संतान हीनता का कारण बनते हैं।

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23 Oct, 2018 Blog

Janiye Kemdrum Yog Ka Kismat Connection / जानिए केमद्रुम योग का किस्मत कनेक्शन

https://youtu.be/7bQbjcb6-CA

जानिए केमद्रुम योग का किस्मत कनेक्शन

किसी भी लग्न की कुंडली में चन्द्र जिस राशि में होता हैं , उसके दूसरे और बारहवें भाव में सूर्य के अलावा अन्य कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम योग होता है अर्थात चन्द्र के दोनों और मंगल , बुध , गुरु , शुक्र ,या शनि में से कोई न कोई ग्रह होना आवश्यक हैं, ऐसा नहीं होने पर दुर्भाग्य के प्रतीक केमद्रुम योग बनता हैं।

इस योग के विषय में जातक पारिजात नामक ग्रन्थ में कहा गया हैं कि--

"योगे केमद्रुमे प्रापो यस्मिन कश्चि जातके।

राजयोगा विशशन्ति हरि दृष्टवां यथा द्विषा: ।।

अर्थात---

जन्म के समय यदि किसी कुंडली में केमद्रुम योग हो और उसकी कुंडली में सैकड़ों राजयोग भी हो तो वह भी विफल हो जातें हैं । अर्थात केमद्रुम योग अन्य सैकड़ों राजयोगो का प्रभाव उसी प्रकार समाप्त कर देता हैं , जिस प्रकार जंगल में सिंह हाथियों का प्रभाव समाप्त कर देता हैं ।

इस योग के जन्मकुंडली में विद्यमान होने पर जातक स्त्री, संतान , धन , घर , वाहन , कार्य व्यवसाय, माता, पिता, अन्य रिश्तेदार अर्थात सभी प्रकार के सुखों से ही होकर ईधर, उधर व्यर्थ भटकने के लिए मजबूर होता हैं । 

जन्मकुंडली के केमद्रुम योग और केमद्रुम भंग योग दोनों होने पर जातक को ग्रहों की दशा , अन्तर्दशा में दोनों ही प्रकार के फलों का सामना करना पड़ता हैं । इस योग का अध्ययन करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र कि कुंडली बहुत बड़ा उदाहरण है,

श्री रामचन्द्र का जन्म कर्क लग्न में हुआ था गुरु एवं चन्द्र लग्न में , तीसरे भाव में राहू , चौथे भाव में शनि , सप्तम भाव में मंगल , नवम भाव में शुक्र , केतु , दशम भाव में सूर्य , एकादश भाव में बुध विराजित हैं  |

कर्क लग्न वाला जातक स्वतः भाग्यशाली होते हैं । साथ ही लग्नस्थ चन्द्र के दोनों और द्वितीय और द्वादश भाव में कोई ग्रह नहीं हैं । अत:केमद्रुम योग विद्यमान प्रतीत होता हैं । इस योग के विपरीत चन्द्र की राशि कर्क स्वयं लग्न भाव में हैं । साथ में ही स्वग्रही चन्द्र भी केंद्र में शक्तिशाली होकर विराजित हैं । जिसके साथ ब्रहस्पति भी हैं ।चन्द्र की उच्च राशि मकर भी सप्तम भाव स्थित केंद्र स्थान में ही हैं । अर्थात केमद्रुम योग भंग की एक ,दो नहीं वरन समस्त शर्त विद्यमान हैं । इन सबके अलावा केंद्र में ब्रहस्पति उच्च का होकर पंचमहायोगों में श्रेष्ठ " हंस योग ",शनि उच्च का होने से शश योग , मंगल उच्च का होकर केंद्र में होने से चक योग को बताता हैं , इनके अलावा गुरु चन्द्र मिलकर ज्योतिष का सबसे महान गज केसरी योग भी बनता हैं साथ ही सूर्य भी अपनी उच्च राशि में होकर अपने कारक स्थान में उपस्थित हैं । शुक्र भाग्य भाव में होकर अपनी उच्च राशि में हैं । अर्थात इस प्रकार के महान योग किसी अलौकिक व्यक्तित्व की जन्म कुंडली में ही हो सकते हैं ।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार  इन महान योगों के होने के बाद भी भगवन श्री राम के जीवन चरित्र पर इस भयानक योग के प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता हैं । भगवान श्री राम के राजतिलक के समय शनि महादशा में मंगल का अंतर चल रहा था , तब राजतिलक होते -होते श्री राम को वनवासी राम बनना पड़ा । अर्थात हम जैसे लोगों के लिए तो इस योग का असर और भी भयानक होगा । इस योग के होने पर इसका निराकरण आवश्यक हैं ।

चंद्रमा मन का कारक हैं इस लिए जब भी कोई मुसीबत , या असफलता मिलती हैं तो दूसरों की अपेक्षा इस योग के पीड़ित को कई गुना महसूस होती हैं । इस योग के चलते थोड़ी सी असफलता से जातक " डिप्रेशन " एवं मानसिक रोगों का भी शिकार हो सकता हैं।

इस योग के कारण जीवन में अधूरापन रहता हैं ।

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23 Oct, 2018 Blog

Is Aayaam Me Prasan Honge Pitradev / इस आयाम में प्रसन्न होंगे पितृदेव

https://youtu.be/EZSNw4I-iKs

इस आयाम में प्रसन्न होंगे पितृदेव 

श्राद्ध, पारिवारिक वृद्धि के लिए आशीर्वाद पाना है । बच्चे होना, विवाह होना और कुटुम्ब में शांति होना श्राद्ध करने का ही फल है ।  वो लोग जो कभी हमारे परिवार का हिस्सा थे, प्राण त्यागकर पितृ-लोक को चले गए । विवाह होना, बच्चा होना और कुटुम्ब में भाई-चारा होना - पितरों के आशीर्वाद का फल है । हमारे पूर्वज - हमारे गुजरे हुए प्रियजन अनैमितिक आत्माओं के रूप में पितृ-लोक में रहते है । अगर हम निरन्तर श्राद्ध, दान, पुण्य और उनकी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, तो समय-समय पर वो हमारे कुटुम्ब-परिवार की सुख-शांति का आशीर्वाद देते है । पारिवारिक वृद्धि के लिए वे स्वयं भी हमारे परिवार में जन्म लेते है ।

पितृ-लोक -

पांचवे आयाम में स्थापित है, हम तीसरे आयाम है । हम पितरों को नहीं देख सकते, लेकिन वो हमको देख सकते है । पारिवारिक वृद्धि के लिए वे हमारी सहायता कर सकते है ।     
उदाहरण के तौर पर - पेड़-पौधे पहले आयाम में पनपते है । धूप, हवा और जल से पोषण पाते है । ये अगर उन्हें ना मिले तो सूख जाएंगे अथवा नष्ट हो जाएंगे । अपने पोषण के लिए ये स्वयं कुछ नहीं कर सकते । इसके लिए उन्हें दूसरे आयाम में जाना पड़ेगा जहां उन्हें पोषण के आवश्यक तत्व मिल सकते हैं । 

दूसरे आयाम का पता है -

जीव-जन्तु, पशु पक्षी और जानवरों को है - जो अपने पालन-पोषण के लिए दूर-दूर तक जाते हैं । जहां तक खाना मिलता है - चलते चले जाते और अगर खाना इन्हें ना मिले तो - ये नहीं जानते कि - खाना कैसे प्राप्त करना है ?  ये उपलब्ध खानपान पर ही निर्भर रहते हैं । क्योंकि - ये तीसरे आयाम को नहीं जानते , जहां विभिन्न संसाधनों से पालन-पोषण के लिए खान-पान तैयार किया जा सकता है । ये तीसरा आयाम मनुष्यों का है जो रचनात्मक प्रवृति के होते है और प्राकृतिक संसाधनों से अपने जीवन यापन को सरल बनाते हैं ।

खानपान हो या संसाधनों का उपयोग -

मूलमंत्र है, शक्ति अर्जित करना । फिर - वो पेड़-पौधे हो, पशु-पक्षी हो या मनुष्य हो । सभी को शक्ति चाहिए । लेकिन पेड़-पौधे और पशु-पक्षी तो केवल जीवन-यापन के लिए ही खानपान के रूप में शक्ति अर्जित करते है परन्तु मनुष्य अति-महत्वाकांक्षी है और रचनात्मक भी है ।  ये चौथा आयाम है । यहां भौतिक-जगत का कोई नियम नहीं चलता यहां तक की भौतिक शरीर भी नहीं चलता - ये सूक्ष्म-जगत है । 

सभी जीव और भौतिक शरीर धारी -

शरीर त्यागने के बाद इसी चौथे आयाम में प्रवेश करते है । ये समय की धारा होती है - जिसके उस पार पांचवां आयाम है ।
जहां समय का जन्म होता है - अथवा जहां समय को देखा जा सकता है - वो चौथा आयाम है । प्रकृति का चमत्कार ये है कि - ये चौथा आयाम अथवा समय सभी आयामों में गुंथा हुआ है । लेकिन शरीर छोड़े बगैर इसे देखा नहीं जा सकता है । हालाकि - योगी और तपस्वी तथा परकाया प्रवेश के दक्ष ज्ञानी - इसे देख लेते हैं और इसका उपयोग भी कर लेते हैं ।
मनुष्य - जब शरीर त्यागता है और इस चौथे आयाम में प्रवेश करता है । तब उसके परिजन उसका अंतिम संस्कार करते है । उसके लिए पूजा-प्रार्थना करते हैं । ताकि वो इस आयाम से परिष्कृत होता हुआ समय की इस धारा को पार कर ले और पितृ-लोक की ओर प्रस्थान करें ।वहां नैमित्तिक आत्माओं के संसर्ग में रहे और फिर से उनके कुटुम्ब-परिवार में जन्म ले सकें ।
चौथे आयाम में असंख्य आत्माएं विचरण करती रहती हैं । इनमे हज़ारों वर्षों से विचरण करती विभिन्न प्रेतात्माएं भी होती है । जिनका अंतिम संस्कार नहीं हुआ, जिनके लिए किसी ने श्राद्ध नहीं किया, किसी ने पूजा-प्रार्थना नहीं की - ऐसी असंख्य आत्माएं इसमें भटक रही हैं ।

जैसे -

पहले आयाम के पेड़-पौधे, मनुष्य को फल, फूल, पत्ते और लकड़ी निरंतर देते रहते है और बदले में मनुष्य उन्हें बनाए रखने का प्रयास करता रहता है । वैसे ही - अगर मनुष्य निरन्तर अपने पूर्वजों के श्राद्ध, दान, पुण्य और पूजा-प्रार्थना करता है । तब पांचवे आयाम में स्थापित पितृ-लोक से पितृ भी मनुष्य को, उसके कुटुम्ब परिवार को और उसके आसपास शांति को बनाए रखने का प्रयास करते हैं ।

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23 Oct, 2018 Blog

Ved Aur Grantho Ka Ye Hai Saar / वेद और ग्रंथों का ये है सार

https://youtu.be/tBdhNXxL9NQ

वेद और ग्रंथों का ये है सार

ग्रथों में जो कहा गया है उसके मायने क्या हैं ये समझना भी बहुत आवश्यक है...  एस्ट्रोमित्रम की पिछली कड़ी में हम आपको ये बता चुके हैं कि हिंदू धर्म के ग्रंथ और वेदों के क्या मायने हैं... अब ये भी जान लीजिए कि इनकी सीख क्या कहती है... 

ईश्वर के बारे में :

ब्रह्म (परमात्मा) एक ही है जिसे कुछ लोग सगुण (साकार) कुछ लोग निर्गुण (निराकार) कहते हैं। हालांकि वह अजन्मा, अप्रकट है। उसका न कोई पिता है और न ही कोई उसका पुत्र है। वह किसी के भाग्य या कर्म को नियंत्रित नहीं करता। ना कि वह किसी को दंड या पुरस्कार देता है। उसका न तो कोई प्रारंभ है और ना ही अंत। वह अनादि और अनंत है। उसकी उपस्थिति से ही संपूर्ण ब्रह्मांड चलायमान है। सभी कुछ उसी से उत्पन्न होकर अंत में उसी में लीन हो जाता है। ब्रह्मलीन।

ब्रह्मांड के बारे में :

यह दिखाई देने वाला जगत फैलता जा रहा है और दूसरी ओर से यह सिकुड़ता भी जा रहा है। लाखों सूर्य, तारे और धरतीयों का जन्म है तो उसका अंत भी। जो जन्मा है वह मरेगा। सभी कुछ उसी ब्रह्म से जन्में और उसी में लीन हो जाने वाले हैं। यह ब्रह्मांड परिवर्तनशील है। इस जगत का संचालन उसी की शक्ति से स्वत: ही होता है। जैसे कि सूर्य के आकर्षण से ही धरती अपनी धूरी पर टिकी हुई होकर चलायमान है। उसी तरह लाखों सूर्य और तारे एक महासूर्य के आकर्षण से टिके होकर संचालित हो रहे हैं। उसी तरह लाखों महासूर्य उस एक ब्रह्मा की शक्ति से ही जगत में विद्यमान है।

आत्मा के बारे में :

आत्मा का स्वरूप ब्रह्म (परमात्मा) के समान है। जैसे सूर्य और दीपक में जो फर्क है उसी तरह आत्मा और परमात्मा में फर्क है। आत्मा के शरीर में होने के कारण ही यह शरीर संचालित हो रहा है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि संपूर्ण धरती, सूर्य, ग्रह नक्षत्र और तारे भी उस एक परमपिता की उपस्थिति से ही संचालित हो रहे हैं।

स्वर्ग और नरक के बारे में :

वेदों के अनुसार पुराणों के स्वर्ग या नर्क को गतियों से समझा जा सकता है। स्वर्ग और नर्क दो गतियां हैं। आत्मा जब देह छोड़ती है तो मूलत: दो तरह की गतियां होती है:- 1.अगति और 2. गति।

धर्म और मोक्ष के बारे में :

धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म का अर्थ है यम और नियम को समझकर उसका पालन करना। नियम ही धर्म है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य होता है। हिंदु धर्म के अनुसार व्यक्ति को मोक्ष के बारे में विचार करना चाहिए। मोक्ष क्या है? स्थितप्रज्ञ आत्मा को मोक्ष मिलता है। मोक्ष का भावर्थ यह कि आत्मा शरीर नहीं है इस सत्य को पूर्णत: अनुभव करके ही अशरीरी होकर स्वयं के अस्तित्व को पूख्‍ता करना ही मोक्ष की प्रथम सीढ़ी है।

व्रत और त्योहार के बारे में :

हिन्दु धर्म के सभी व्रत, त्योहार या तीर्थ सिर्फ मोक्ष की प्राप्त हेतु ही निर्मित हुए हैं। मोक्ष तब मिलेगा जब व्यक्ति स्वस्थ रहकर प्रसन्नचित्त और खुशहाल जीवन जीएगा। व्रत से शरीर और मन स्वस्थ होता है। त्योहार से मन प्रसन्न होता है और तीर्थ से मन और मस्तिष्क में वैराग्य और आध्यात्म का जन्म होता है।

तीर्थ के बारे में :

तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थों में चार धाम, ज्योतिर्लिंग, अमरनाथ, शक्तिपीठ और सप्तपुरी की यात्रा का ही महत्व है। अयोध्या, मथुरा, काशी और प्रयाग को तीर्थों का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जबकि कैलाश मानसरोवर को सर्वोच्च तीर्थ माना है। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी ये चार धाम हैं। 

संस्कार के बारे में :

संस्कारों के प्रमुख प्रकार सोलह बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिंदू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम है-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह मनुष्य के सभ्य और हिन्दू होने की निशानी है। उक्त संस्कारों को वैदिक नियमों के द्वारा ही संपन्न किया जाना चाहिए।

पाठ करने के बारे में :

वेदो, उपनिषद या गीता का पाठ करना या सुनना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। उपनिषद और गीता का स्वयंम अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है। प्रतिदिन धर्म ग्रंथों का कुछ पाठ करने से देव शक्तियों की कृपा मिलती है। हिन्दू धर्म में वेद, उपनिषद और गीता के पाठ करने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है। वक्त बदला तो लोगों ने पुराणों में उल्लेखित कथा की परंपरा शुरू कर दी, जबकि वेदपाठ और गीता पाठ का अधिक महत्व है।

धर्म, कर्म और सेवा के बारे में :

धर्म-कर्म और सेवा का अर्थ यह कि हम ऐसा कार्य करें जिससे हमारे मन और मस्तिष्क को शांति मिले और हम मोक्ष का द्वार खोल पाएं। साथ ही जिससे हमारे सामाजिक और राष्ट्रिय हित भी साधे जाते हों। अर्थात ऐसा कार्य जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं को लाभ मिले। धर्म-कर्म को कई तरीके से साधा जा सकता है, जैसे- 1.व्रत, 2.सेवा, 3.दान, 4.यज्ञ, 5.प्रायश्चित, दीक्षा देना और मंदिर जाना आदि।

दान के बारे में :

दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। देव आराधना का दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेदों में तीन प्रकार के दाता कहे गए हैं- 1.उक्तम, 2.मध्यम और 3.निकृष्‍ट। धर्म की उन्नति रूप सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्‍यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्‍ट माना गया है। पुराणों में अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्‍य भी है।

यज्ञ के बारे में :

यज्ञ के प्रमुख पांच प्रकार हैं- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ। यज्ञ पालन से ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण, धर्म ऋण, प्रकृति ऋण और मातृ ऋण समाप्त होता है। नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है। देवयज्ञ सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। अग्नि जलाकर होम करना अग्निहोत्र यज्ञ है। पितृयज्ञ को श्राद्धकर्म भी कहा गया है। यह यज्ञ पिंडदान, तर्पण और सन्तानोत्पत्ति से सम्पन्न होता है। 

मंदिर जाने के बारे में :

प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए: घर में मंदिर नहीं होना चाहिए। प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए। मंदिर में जाकर परिक्रमा करना चाहिए। भारत में मंदिरों, तीर्थों और यज्ञादि की परिक्रमा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। मंदिर की 7 बार (सप्तपदी) परिक्रमा करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह 7 परिक्रमा विवाह के समय अग्नि के समक्ष भी की जाती है। इसी प्रदक्षिण को इस्लाम धर्म ने परंपरा से अपनाया जिसे तवाफ कहते हैं। प्रदक्षिणा षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। हिन्दू सहित जैन, बौद्ध और सिख धर्म में भी परिक्रमा का महत्व है। इस्लाम में मक्का स्थित काबा की 7 परिक्रमा का प्रचलन है। पूजा-पाठ, तीर्थ परिक्रमा, यज्ञादि पवित्र कर्म के दौरान बिना सिले सफेद या पीत वस्त्र पहनने की परंपरा भी प्राचीनकाल से हिन्दुओं में प्रचलित रही है। मंदिर जाने या संध्यावंदन के पूर्व आचमन या शुद्धि करना जरूरी है। इसे इस्लाम में वुजू कहा जाता है।

संध्यावंदन के बारे में :

संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। मंदिर में जाकर संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि आठ वक्त की मानी गई है। उसमें भी पांच महत्वपूर्ण है। पांच में से भी सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है। संध्योपासना के चार प्रकार है- 1.प्रार्थना, 2.ध्यान, 3.कीर्तन और 4.पूजा-आरती। व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है।

धर्म की सेवा के बारे में :

धर्म की प्रशंसा करना और धर्म के बारे में सही जानकारी को लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। धर्म प्रचार में वेद, उपनिषद और गीता के ज्ञान का प्रचार करना ही उत्तम माना गया है। धर्म प्रचारकों के कुछ प्रकार हैं। हिन्दू धर्म को पढ़ना और समझना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझकर ही उसका प्रचार और प्रसार करना जरूरी है। धर्म का सही ज्ञान होगा, तभी उस ज्ञान को दूसरे को बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रचारक होना जरूरी है। इसके लिए भगवा वस्त्र धारण करने या संन्यासी होने की जरूरत नहीं। स्वयं के धर्म की तारीफ करना और बुराइयों को नहीं सुनना ही धर्म की सच्ची सेवा है।
 

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23 Oct, 2018 Blog

Ghat Raha Hai Ashubh To Kundali Me Dekhe Rahu Aur Shani Ki Istithi / घट रहा है कुछ अशुभ तो कुंडली में देखें राहु और शनि की स्थिति

https://youtu.be/0_ktZZzO9aY

घट रहा है कुछ अशुभ तो कुंडली में देखें राहु और शनि की स्थिति

जब जन्म-पत्रिका के किसी भी भाव में शनि-राहू या शनि-केतू की युति हो तो प्रेत श्राप कानिर्माण करती है |

शनि-राहू या शनि-केतू की युति उस भाव के फल को पूरी तरह बिगाड़ देती है तथा लाख यत्न करने पर भी उस भाव का उत्तम फल प्राप्त नहीं होता है हर बार आशा तथा हर बार धोखा की आँख मिचौली जीवन भर चलती रहती है | वह चाहे धन का भाव हो, सन्तान सुख, जीवन साथी या कोई अन्य भाव | भाग्य हर कदम पर रोड़े लेकर खड़ा सा दिखता है जिसको पार करना बार-बार की हार के बाद जातक के लिए अत्यन्त कठिन होता है शनि + राहू = प्रेत श्राप योग यानि ऐसी घटना जिसे अचनचेत घटना कहा जाता है अचानक कुछ ऐसा हो जाना जिसके बारे में दूर दूर तक अंदेशा भी न हो और भारी नुकसान हो जाये | इस योग के कारण एक के बाद एक मुसीबत

बढ़ती जाती है यदि शनि या राहू में से किसी भी ग्रह की दशा चल रही हो या आयुकाल चल रहा हो यानी 7 से 12 या 36 से लेकर 47 वर्ष तक का समय हो तो मुसीबतों का दौर थमता नहीं है।

कई बार ऐसा भी होता है किसी शुभ या योगकारी ग्रह की दशा काल हो और शनि + राहू रूपी प्रेत श्राप योग की दृष्टि का दुष्प्रभाव उस ग्रह पर हो जाये तो उस शुभ ग्रह के समय में भी मुसीबतें पड़ती हैं जिस पर अधिकतर ज्योतिष गण ध्यान नही देते परन्तु पूर्व जन्म के दोषों में इसे शनि ग्रह से निर्मित पितृ दोष कहा जाता है इस दोष का निवारण भी घर में सन्तान के जन्म लेते ही ब्राह्मण की सहायता से करवा लेना चाहिए अन्यथा मकान सम्बन्धी परेशानियाँ शुरू हो जाती है प्रॉपर्टी बिकनी शुरू हो जाती है कारखाने बंद हो जाते हैं | पिता पर कर्जा चढना शुरू हो जाता है

नौकरी पेशा हो कारोबारी संतान के प्रेत श्राप योग के कारण बाप का काम बंद होने के कगार पर पहुंच जाता है। ऐसे योग वाले के घर में निशानी होती है की जगह जगह दरारें पड़ना सफाई के बावजूद भी गंदी बदबू आते रहना घर में से जहरीले जीव जन्तु निलकना बिच्छू - सांप आदि इस लिए ये प्रेत श्राप योग भारी मुसीबतें ले कर आता है। और इस योग के दशम भाव पर प्रभाव के कारण ही चलते हुए कामबंद हो जाते हैं।

सप्तम भाव पर प्रभाव के कारण ही शादियां टूट जाती हैं। अष्टम भाव पर इसका प्रभाव हो तो जातक पर जादू – टोना जैसा अजीब सा प्रभाव रहता है और दर्द नाक मौत होती है नवम भाव में हो तो भाग्यहीनता ही रहती है एकादश भाव में हो तो मुसीबतों से लड़ता लड़ता इंसान हार कर बैठ जाता है मेहनत के बाद भी फल नही पाता आदि कुंडली के सभी भावों में इसका बुरा प्रभाव रहता है मित्रों ज्योतिष कोई जादू की छड़ी नहीं है। ज्योतिष एक विज्ञान है। ज्योतिष में जो ग्रह आपको नुकसान करते है उनके प्रभाव को कम कर दिया जाता है और जो ग्रह शुभ फल देता है, उनके प्रभाव को बढ़ा दिया जाता है ।

राहु को आकस्मिक लाभ का कारक माना गया है राहु से कबाड़ का और बिजली द्वारा किये जाने वाले काम को देखा जाता है। राहु का सम्बन्ध ससुराल से होता है यदि शनि और राहु एक साथ एक ही भाव में आ जाये तो व्यक्ति को प्रेत बाधा आदि टोने टोटके बहुत जल्दी असर करते हैं। क्योंकि कुछ शनि को प्रेत भी मानते हैं और राहु छाया है इसे प्रेत छाया योग भी कहा जाता है पर सामान्य व्यक्ति इसे पितृदोष कहता हैं। यदि राहु की बात की जाये तो राहु जब भी मुश्किल में होता है। तो शनि के पास भागता है राहु सांप को माना गया है और शनि पाताल मतलब धरती के नीचे सांप धरती के नीचे ही धीक निवास करता है इसका एक उदहारण यह भी है कि यदि किसी चोर या मुजरिम राजनेता रुपी राहु पर मंगल रुपी पुलीस या सूर्य रुपी सरकार का पंजा पड़ता है तो वे अपने वकील रुपी शनि के पास भागते हैं। सीधी बात है राहु सदैव शनि पर निर्भर करता है पर जब शनि के साथ बैठ जाता है तो शनि के फल का नाश कर देता है शनि उस व्यक्ति को कभी बुरा फल नहीं देते जो मजदूरों और फोर्थ क्लास लोगों का सम्मान करता है क्योंकि मजदूर शनि के कारक है जो छोटे दर्जे के लोगो का सम्मान नहीं करता उसे शनि सदैव बुरा फल ही देते हैं। आप अपनी कुंडली ध्यान से देखे अगर आपकी कुंडली में भी राहु और शनि एक साथ बैठे है तो आप अपनी कुंडली ज़रूर दिखाये।

 

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22 Oct, 2018 Blog

Sarvtobhadra Chakra Banate Samay In Baton Ka Rakhe Dhyan / सर्वतोभद्र चक्र बनाते समय इन बातों का रखें ध्यान

https://youtu.be/p4VjSkcmhJg

सर्वतोभद्र चक्र बनाते समय इन बातों का रखें  ध्यान

सर्वतोभद्र चक्र नक्षत्र आधारित फलादेश की एक विकसित तकनीक है। यह कुंडली विश्लेषण तथा दशा फलकथन में बहुत सहायक होता है। इसकी सहायता से जन्मकुंडली और उसकी नक्षत्र आधारित शुभ अशुभ विशेषताओं की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। यह गोचर फलादेश में भी सहायता करता है। इसे सर्वतोभद्र चक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि यह चारों ओर से एक समान होता है।

इसीलिए जो मकान चारों ओर से एक सा हो और उसके चारों ओर पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण में मध्य में मुख्य द्वार हो उसे सर्वतोभद्र आकार का मकान कहते हैं।

यह शतरंज की विसात की तरह होता है। इसमें 81 कोष्ठक होते हैं। इसमें अंकित 33 अक्षरों, 16 स्वरों, 15 तिथियों, 7 वारों, 28 नक्षत्रों और 12 राशियों को सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु की गति के फलस्वरूप वेध आने के कारण उन अक्षरादि के नाम वाले जातकों की अवनति अथवा उन्नति होती है।

इस चक्र को बनाने के लिए 10 खड़ी और 10 आड़ी रेखाएं खींची जाती हैं। इस चक्र में 33 अक्षर, 16 स्वर, 15 तिथियां, 7 वार, 28 नक्षत्र और 12 राशियां अंकित होती हैं।

  • अश्विन्यादि 27 नक्षत्रों के नामाक्षरों की जो सूची पंचांगों में दी गई है उसमें कृत्तिका नक्षत्र से प्रारंभ करने से अ, ब, क, घ, ड़, छ, ह, ड, म, ट, प, ष, ण, ठ, र, त, न, य, भ, ध, फ, ठ, ज, ख, ग, स, द, थ, भ, च, ल इनमें से रेखांकित शब्दों को एक साथ रखें तो अ ब क ह ड म ट प र त न य भ ज ख ग स द च ल ये अक्षर बनते हैं।

इन्हीं 20 अक्षरों को सर्वंतोभद्र चक्र में अंदर रखा गया है।

  • ईशानादि चारों कोण दिशाओं में 16 स्वर सोलह कोष्ठकों में सीधे क्रम से एक-एक करके चार चक्करों में लिखे जाते हैं जैसे

ईशान कोण में अ,उ,लृ, ओ,

अग्नि कोण में ऊ,लृ,औ, ये,

नैऋत्य कोण में इ,ऋ,ए, अं और वायव्य कोण में ई, ऋ, ऐ, अः स्वर अंकित किए जाते हैं।

  • इसी प्रकार चारों दिशाओं में 28 नक्षत्र अंकित किए जाते हैं, जैसे पूर्व में कृत्तिका आदि सात नक्षत्र, दक्षिण में मघा आदि सात नक्षत्र, पश्चिम में अनुराधा आदि सात नक्षत्र एवं उत्तर में धनिष्ठा आदि 7 नक्षत्र अंकित किए जाते हैं।
  • इसी प्रकार पूर्व में अ, व, क, ह, ड पांच अक्षर, दक्षिण में म,ट,प,र,त ये पांच अक्षर, पश्चिम में न,य,भ,ज, ख पांच अक्षर एवं उत्तर में ग,स,द,च,ल पांच अक्षर अंकित किए जाते हैं।
  • इसी प्रकार पूर्व में अ,व,क,ह,ड पांच अक्षर अंकित किए जाते हैं।
  • इसी प्रकार मेषादि बारह राशियों को चारों दिशाओं में अंकित करते हैं, जैसे पूर्व में वृष, मिथुन, कर्क, दक्षिण में सिंह, कन्या, तुला,पश्चिम में वृश्चिक, धनु, मकर और उत्तर में कुंभ, मीन, मेष राशियां अंकित की जाती हैं।
  • शेष पांच कोष्ठकों में नंदादि पांच प्रकार की तिथियां अंकित की जाती हैं, जैसे पूर्व में नंदा, दक्षिण में भद्रा, पश्चिम में जया, उत्तर में रिक्ता और मध्य में पूर्णा को लिखा जाता है।
  • अंततः रवि व मंगल वार को नंदा के साथ, सोम व बुध वार को भद्रा के साथ, गुरु को जया के साथ, शुक्र को रिक्ता के साथ एवं शनि वार को पूर्णा के साथ उसी कोष्ठक में अंकित में करते हैं।
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