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26 Oct, 2018 Blog

Janmwar Ke Anusar Kaisa Hai Apka Bhavisya / जन्मवार के अनुसार कैसा होगा आपको भविष्य और स्वभाव

https://youtu.be/dogyBxkE0XE

जन्म वार के अनुसार जानिए कैसा होगा आपको भविष्य और स्वभाव


ज्योतिष के अनुसार राशि और लग्न के अलावा जन्म का वार भी आपका स्वभाव बताता है। आप जिस दिन या वार को जन्म लेते हैं, उसके अनुसार आपका स्वभाव तय होता है। किसी भी व्यक्ति का स्वभाव उसके जन्म के वार को जानकर समझा जा सकता है। 
रविवार - रविवार को जन्मे व्यक्ति पर सूर्य का प्रभाव रहता है। ऐसे जातक का स्वभाव निर्भिक, लेकिन उदार रहता है। रंग गेंहुआ और कपाल चौड़ा रहता है। वह बलशाली व्यक्तित्व का धनी होता है।
सोमवार - सोमवार को जन्मे व्यक्ति पर चंद्र का प्रभाव रहता है। ऐसे व्यक्ति का स्वभाव शांत तथा आध्यात्मिक विचारों से संपन्न रहता है। उसकी वाणी में मिठास और मधुरता रहती है। वह गंभीर और भावुक रहता है।  
मंगलवार - मंगलवार को जन्मे व्यक्ति पर मंगल ग्रह का प्रभाव रहता है। ऐसे व्यक्ति का यदि मंगल खराब है तो वह तामसी प्रवृत्ति का होगा तथा सदा क्रोधी, जिद्दी स्वभाव कर रहेगा । यदि मंगल अच्छा है, तो व्यक्ति निर्भिक, नीडर और न्यायप्रिय रहेगा तथा हर परिस्थिति में बुद्धि से काम लेगा।
बुधवार - बुधवार को जन्मे व्यक्ति पर बुध ग्रह का प्रभाव रहता है। ऐसा व्यक्ति कला एवं व्यापार में निपुण रहता है। वाणी में मिठास और चेहरे पर आकर्षण रहता है, लेकिन अगर कुंडली में बुध की स्थिति खराब है, तो ऐसे व्यक्ति चालाक और दिव्या स्वप्न देखने वाला रहेगा। और उसकी बुद्धि में हमेशा दुविधा और संशय बना रहेगा।
गुरुवार - गुरुवार को जन्मे व्यक्ति पर बृहस्पति ग्रह का प्रभाव रहता है। ऐसा व्यक्ति गंभीर चिंतन करने वाला और धार्मिक स्वभाव से संपन्न रहता है। उसके स्वभाव में मिलन सारिता और सर्व हिताय की भावना रहती है। लेकिन यदि गुरु की स्थिति ठीक नहीं है तो ऐसा व्यक्ति ढ़ोंगी साधु या ढ़ोंगी बन सकता है। असत्य बोलने वाला और लोगों को अपने झूठे ज्ञान से भ्रम में डालने वाले रहेगा।
शुक्रवार - शुक्रवार को जन्मे व्यक्ति पर शुक्र ग्रह का प्रभाव माना गया है। यदि शुक्र ग्रह ठीक है तो व्यक्ति कलाप्रिय और तेज बुद्धि का होगा। आधुनिक विचारों को महत्व देने वाला और स्वभाव से विनम्र होगा। लोगों को अपनी बातों और कार्यों से प्रभावित करने में कुशल लेकिन यदि शुक्र ग्रह खराब है, तो विलासितापूर्ण जीवन बिताने वाला और आरामपसंद व्यक्ति माना जाएगा।
शनिवार - शनिवार को जन्म जातक पर शनि ग्रह का प्रभाव माना गया है, तो यदि शनि शुभ स्थिति में है, तो व्यक्ति न्यायप्रीय, कलाप्रिय और कर्मवान होगा। स्पष्टवादी और सिद्धांतप्रिय स्वभाव का रहेगा, लेकिन यदि शनि की स्थिति ठीक नहीं है तो गरम स्वभाव, निर्बल शरीर और आलसी स्वभाव का रहेगा।

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26 Oct, 2018 Blog

Prem Vivah Se Pehle Kundli Me Jaanch Lein Ye Yog / प्रेम विवाह से पहले कुंडली में जांच लें ये योग

https://youtu.be/Hk7cdMH0wRc

प्रेम विवाह से पहले कुंडली में जांच लें ये योग


ज्योतिष में प्रेम- संबंधों और प्रेम-विवाह को लेकर हमेश से ही दिलचस्पी रही है। ज्योतिषी शास्त्र में कई ऐसी ग्रह दशाओं और योगों का वर्णन है, जिनकी वजह से व्यक्ति प्रेम करता है और स्थिति प्रेम-विवाह तक पहुंच जाती है।
– प्रेम विवाह में कारक ग्रहों के साथ यदि अशुभ व क्रूर ग्रह बैठ जाते हैं तो प्रेम-विवाह में बाधा आ जाती है। यदि प्रेम-विवाह का कुण्डली में योग न हो तो प्रेम-विवाह नहीं होता। आइए, जानें ऐसे कुछ ज्योतिषीय योगों के बारे में-
प्रेम-विवाह के ज्योतिषीय योग-
1. जन्म पत्रिका में मंगल यदि राहू या शनि से युति बना रहा हो तो प्रेम-विवाह की संभावना होती है।
2. जब राहू प्रथम भाव यानी लग्न में हो परंतु सातवें भाव पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो व्यक्ति परिवार के विरुद्ध जाकर प्रेम-विवाह की तरफ आकर्षित होता है।
3. जब पंचम भाव में राहू या केतु विराजमान हो तो व्यक्ति प्रेम-प्रसंग को विवाह के स्तर पर ले जाता है।
4. जब राहू या केतु की दृष्टि शुक्र या सप्तमेश पर पड़ रही हो तो प्रेम-विवाह की संभावना प्रबल होती है।
5. पंचम भाव के मालिक के साथ उसी भाव में चंद्रमा या मंगल बैठे हों तो प्रेम-विवाह हो सकता है।
6. सप्तम भाव के स्वामी के साथ मंगल या चन्द्रमा सप्तम भाव में हो तो भी प्रेम-विवाह का योग बनता है।
7. पंचम व सप्तम भाव के मालिक या सप्तम या नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ विराजमान हों तो प्रेम-विवाह का योग बनता है।
8. जब सातवें भाव का स्वामी सातवें में हो तब भी प्रेम-विवाह हो सकता है।
9. शुक्र या चन्द्रमा लग्न से पंचम या नवम हों तो प्रेम विवाह कराते हैं।
10. लग्न व पंचम के स्वामी या लग्न व नवम के स्वामी या तो एकसाथ बैठे हों या एक-दूसरे को देख रहे हों तो प्रेम-विवाह का योग बनाते हैं यह।
11. सप्तम भाव में यदि शनि या केतु विराजमान हों तो प्रेम-विवाह की संभावना बढ़ती है।
12. जब सातवें भाव के स्वामी यानी सप्तमेश की दृष्टि द्वादश पर हो या सप्तमेश की युति शुक्र के साथ द्वादश भाव में हो तो प्रेम-विवाह की उम्मीद बढ़ती है।

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26 Oct, 2018 Blog

Istri Ki Kundli Me Ho Ye Yog To Dhanwaan Hoga Pati / स्त्री की कुंडली में हों ये योग तो धनवान होगा पति

https://youtu.be/1U2msXo4BSI

स्त्री की कुंडली में हों ये योग, तो धनवान होगा पति

कहते हैं स्त्रियां लक्ष्मी का रूप होती हैं। कैसे किसी स्त्री के साथ जुड़ता है लक्ष्मीस्वरूपा होने का योग चलिए आज जानते हैं कि स्त्री की कुंडली में कौन से ग्रह योग होते हैं। 
यदि स्त्री स्वयं अपने पाँवों पर खडी हो तो वह राजयोग के फल का स्वयं उपभोग करती है, यदि पति के अधीन हो तो राजयोगों का लाभ उसके पति को मिलता है और पति के माध्यम से ही वह स्वयं सुख, यश, कीर्ति तथा ऐश्वर्य आदि का उपभोग करती है ।

१- यदि सप्तम भाव में शुक्र तथा अन्य शुभ ग्रह हों तो ऐसी स्त्री ऐश्वर्यशालिनी होती है ।
२- यदि लग्न में चन्द्रमा, दशम भाव में बुध तथा एकादश भाव में सूर्य हो तो ऐसी स्त्री बहुत पुत्र तथा पौत्रों वाली एवं ऐश्वर्यशालिनी होती है ।
३- यदि लग्न में उच्च का बुध, द्वितीय भाव में शुक्र, दशम भाव में चन्द्रमा तथा एकादश भाव में गुरु हो तो ऐसी स्त्री समाज में राजपत्नी के समान तथा ऐश्वर्यशालिनी होती है ।
४- यदि लग्न में गुरु, सप्तम भाव में चन्द्रमा तथा दशम भाव में शुक्र हो तो ऐसी स्त्री नीचकुल में उत्पन्न होने पर भी रानी के समान सुखी तथा ऐश्वर्यशालिनी होती है ।
५- यदि लग्न में कर्क राशि का गुरु अथवा मीन राशि का शुक्र हो तथा कन्या राशि में बुध एवं सप्तम भाव में उच्चस्थ मंगल हो तो ऐसी स्त्री को अत्यधिक सुख प्राप्त होता है । 
६- यदि लग्न में कन्या राशि हो और उसमें बुध, शुक्र की युति हो तथा वृषभ राशि का चन्द्रमा अथवा कर्क या मीन राशि का गुरु हो तो ऐसी स्त्री को राजकन्या की भांति सुख प्राप्त होता है ।
७- यदि लग्न में उच्चस्थ बुध तथा एकादश भाव में गुरु हो तो ऐसी स्त्री को राजपत्नी के समान सुख प्राप्त होता है ।
८- यदि चतुर्थ भाव में उच्च का चन्द्रमा गुरु से दृष्ट हो तो ऐसी स्त्री देवी के समान श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सौभाग्यशालिनी होती है ।
९- यदि सप्तम भाव में कर्क राशि हो तथा सूर्य एवं गुरु की उस पर पूर्ण दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री पुत्र-पौत्रादि के सुख से सपन्न ऐश्वर्यशालिनी होती है ।
१०- यदि सप्तम भाव में मिथुन, सिंह, कन्या, तुला अथवा कुम्भ राशि का चन्द्रमा हो तथा प्रथम लग्न चतुर्थ एव दशम भाव में पापग्रह न हों तो ऐसी स्त्री शत्रु पर विजय प्राप्त करने वाली, पति द्वारा सम्मानित एवं राजपत्नी के समान ऐश्वर्यशालिनी तथा सुखी होती है ।
११- यदि एकादश भाव में चन्द्रमा एवं सप्तम भाव में बुध तथा शुक्र हों और गुरु की उन पर दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री समाज में प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाली तथा ऐश्वर्यशालिनी होती है ।
१२- यदि लग्न, तृतीय, पंचम नवम- इन्हें छोडकर अन्य किसी भी भाव में, राहु के अतिरिक्त, चार शुभग्रह हों तो ऐसी स्त्री समाज में राजपत्नी के समान सन्मान अर्जित करती है ।
१३- यदि केन्द्र में कोई राशि शुभ ग्रहों से युक्त हो तथा सप्तम भाव में मेष, मिथुन, कन्या अथवा कुम्भराशि युक्त कोई पापग्रह हो तो ऐसी स्त्री विशेष सुखी एवं ऐश्वर्यशालिनी होती है ।
१४- यदि सप्तम अथवा अष्टम भाव में शुभग्रह की दृष्टि हो अथवा उक्त स्थान सुभ से युक्त हों तो ऐसी स्त्री सौभाग्यवती, शीलवती, आचार सम्पन्ना, दीर्घायु, पतिव्रता एवं पति की आज्ञाकारिणी होती है ।
१५ – यदि सप्तम तथा अष्टम भाव में पापग्रह हों, परन्तु नवम भाव शुभग्रहों से युक्त हो तो ऐसी स्त्री पति एवं पुत्र से युक्त तथा सुखी रहती है ।
१६- यदि सप्तम भाव में कर्क राशि गत चन्द्रमा हो तथा उसके साथ गुरु भी हो तो ऐसी स्त्री सुन्दरता में साक्षात रति समान होती ।
१७- सप्तम भाव में सम राशि ( वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर तथा मीन) हो और वह शुभ ग्रहों से दृष्ट अथवा युक्त हो तो ऐसी स्त्री पुण्यवान एवं राजमान्य होती है ।
१८- यदि सप्तम भाव में मीन का शुक्र हो तो ऐसी स्त्री सुन्दर नेत्रों वाली, उत्तम वस्त्रालंकारों से युक्त तथा संगीत-कला में प्रवीणा होती है ।
१९- यदि सप्तम भाव में बुध तथा चन्द्रमा हों तो ऐसी स्त्री सब कलाओं को जानने वाली, गुणवती तथा सुखी होती है ।
२०- यदि सप्तम भाव में शुक्र और बुध हों तो ऐसी स्त्री अत्यन्त सुन्दरी, सब कलाओं की जानने वाली तथा भाग्यशालिनी होती है ।
२१- यदि सप्तम भाव में शुक्र तथा चन्द्रमा हो तो ऐसी स्त्री सुन्दरी, सुख-सम्पन्ना, परन्तु ईर्ष्यालु-स्वभाव की होती है ।
२२- यदि केवल षडवर्ग में शुक्र केतु में बैठा हो और उस पर चन्द्रमा की दृष्टी हो तो ऐसी स्त्री अत्यन्त सुन्दर, स्थूल नितम्बों वाली, धन-पुत्रादि से सम्पन्न, (सुखी तथा रानी के समान ऐश्वर्य -शालिनी होती है ।
२३- यदि कर्क लग्न का उदय हो, सप्तमभाव में सूर्य हो और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री अप्सराओं मे प्रधान अथवा रानी के समान सुन्दरी, स्वस्थ, ऐश्वर्यशालिनी तथा पुत्र-पौत्री से युक्त होती है ।
२४- यदि शुभ ग्रह केन्द्र में हों तथा पापग्रह छठे, एवं बारहवें भाव में हों तो ऐसी स्त्री सुन्दर, शान्त स्वभाव वाली, धनवती गुणवती, पुत्रवती, ऐश्वर्यशालिनी तथा रानी के समान होती है ।
२५- यदि षडवर्ग में शुद्ध होकर तीन ग्रह केन्द्र में पडे हों तो ऐसी स्त्री रानी होती है ।
२६- यदि बुध उच्च का होकर लग्न में बैठा हो तथा गुरु एकादश भाव में हो, तो ऐसी स्त्री राज-पत्नी अथवा रानी के समान ऐश्वर्यशालिनी होती है तथा उसकी गणना संसार की प्रसिद्ध स्त्रियों में की जाती है ।
२७- यदि वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर एवं मीन राशि में मंगल, बुध, गुरु तथा शुक्र हों तो ऐसी स्त्री बडी विदुषी, साध्वी, गुणवती तथा पुत्रवती होती है।

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26 Oct, 2018 Blog

Is Mantra Se Door Honge Netra Rog / इस मंत्र से दूर होंगे नेत्ररोग

https://youtu.be/UBc7YWzkrBg

इस मंत्र से दूर होंगे नेत्ररोग

नेत्र रोग इन दिनों एक आम समस्या है। कभी लंबे समय तक कंप्यूटर पर काम करके या फिर मोबाइल को ज्यादा देर देखने से ये विकार और बढ़ रहा है। इसलिए आज आपको बताते हैं कुछ ऐसे आसान उपाय। जिन्हें आजमा कर आप आंखों में होने वाली तकलीफ से छुटकारा पा सकते हैं। 
नेत्ररोग होने पर भगवान सूर्यदेव की रामबाण उपासना है।
इस अदभुत मंत्र से सभी नेत्ररोग आश्चर्यजनक रीति से अत्यंत शीघ्रता से ठीक होते हैं। सैंकड़ों साधकों ने इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया है।
सभी नेत्र रोगियों के लिए चाक्षुषोपनिषद् प्राचीन ऋषि मुनियों का अमूल्य उपहार है। इस गुप्त धन का स्वतंत्र रूप से उपयोग करके अपना कल्याण करें।
शुभ तिथि के शुभ नक्षत्रवाले रविवार को इस उपनिषद् का पठन करना प्रारंभ करें। पुष्य नक्षत्र सहित रविवार हो तो वह रविवार कामनापूर्ति के  लिए पठन करने के लिए सर्वोत्तम समझें। प्रत्येक दिन चाक्षुषोपनिषद् का कम से कम बारह बार पाठ करें। बारह रविवार  पूर्ण होने तक यह पाठ करना होता है। रविवार के दिन भोजन में नमक नहीं लेना चाहिए।
प्रातःकाल उठें। स्नान आदि करके शुद्ध हों। आँखें बन्द करके सूर्यदेव के सामने खड़े होकर भावना करें कि ‘मेरे सभी प्रकार के नेत्ररोग भी सूर्यदेव की कृपा से ठीक हो रहे हैं।’ लाल चन्दनमिश्रित जल ताँबे के पात्र में भरकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। संभव हो तो षोडशोपचार विधि से पूजा करें। श्रद्धा-भक्तियुक्त अन्तःकरण से नमस्कार करके ‘चाक्षुषोपनिषद्’ का पठन प्रारंभ करें।

ॐ अस्याश्चाक्क्षुषी विद्यायाः अहिर्बुधन्य ऋषिः। गायत्री छंद। सूर्यो देवता। चक्षुरोगनिवृत्तये जपे विनियोगः।

ॐ इस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुधन्य हैं। गायत्री छंद है। सूर्यनारायण देवता है। नेत्ररोग की निवृत्ति के लिए इसका जप किया जाता है। यही इसका विनियोग है।

मंत्र इस प्रकार है.. 
ग्राफिक्स इन- ॐ चक्षुः चक्षुः तेज स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरित चक्षुरोगान् शमय शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय। यथा अहं अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय। कल्याणं कुरु करु।

याति मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूल्य निर्मूलय। ॐ नम: चक्षुस्तेजोरत्रे दिव्व्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणाकराय अमृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमः भगवते सूर्यायाक्षि तेजसे नमः।खेचराय नमः। महते नमः। रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवांछुचिरूपः। हंसो भगवान शुचिरप्रति-प्रतिरूप:।ये इमां चाक्षुष्मती विद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा विद्या-सिद्धिर्भवति। ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा। ग्राफिक्स आउट

ॐ हे सूर्यदेव ! आप मेरे नेत्रों में नेत्रतेज के रूप में स्थिर हों। आप मेरा रक्षण करो, रक्षण करो। शीघ्र मेरे नेत्ररोग का नाश करो, नाश करो। मुझे आपका स्वर्ण जैसा तेज दिखा दो, दिखा दो। मैं अन्धा न होऊँ, इस प्रकार का उपाय करो, उपाय करो। मेरा कल्याण करो, कल्याण करो। मेरी नेत्र-दृष्टि के आड़े आने वाले मेरे पूर्वजन्मों के सर्व पापों को नष्ट करो, नष्ट करो। ॐ ( नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले, दिव्यस्वरूप भगवान भास्कर को नमस्कार है। ॐ करुणा करने वाले अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ भगवान सूर्य को नमस्कार है। ॐ नेत्रों का प्रकाश होने वाले भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है। ॐ आकाश में विहार करने वाले भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है। ॐ रजोगुणरूप सूर्यदेव को नमस्कार है। अन्धकार को अपने अन्दर समा लेने वाले तमोगुण के आश्रयभूत सूर्यदेव को मेरा नमस्कार है।

हे भगवान ! आप मुझे असत्य की ओर से सत्य की ओर ले चलो। अन्धकार की ओर से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु की ओर से अमृत की ओर ले चलो।

उष्णस्वरूप भगवान सूर्य शुचिस्वरूप हैं। हंसस्वरूप भगवान सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं। उनके तेजोमय रूप की समानता करने वाला दूसरा कोई नहीं है।

जो कोई इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है उसको नेत्ररोग नहीं होते हैं, उसके कुल में कोई अन्धा नहीं होता है। आठ ब्राह्मणों को इस विद्या का दान करने पर यह विद्या सिद्ध हो जाती है
 

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26 Oct, 2018 Blog

Kundli Me Chandra Dosh To Aise Kare Chandra Puja / कुंडली मे हो चंद्र दोष तो इस विधि से करे चंद्र पूजा

https://youtu.be/rG2M2e0Efp4

अगर कुंडली में हो चंद्र दोष, तो इस विधि से करवाएं चंद्र पूजा

चन्द्र पूजा का सुझाव मुख्य रूप से किसी कुंडली में अशुभ रूप से कार्य कर रहे चन्द्र की अशुभता को कम करने के लिए, अशुभ चन्द्र द्वारा कुंडली में बनाए जाने वाले किसी दोष के निवारण के लिए या किसी कुंडली में शुभ रूप से कार्य कर रहे चन्द्र की शक्ति और शुभ फल बढ़ाने के लिए देता है। चन्द्र पूजा का आरंभ सामान्यतया सोमवार वाले दिन किया जाता है और उससे अगले सोमवार को इस पूजा का समापन कर दिया जाता है जिसके चलते इस पूजा को पूरा करने के लिए सामान्यता 7 दिन लगते हैं, लेकिन कुछ स्थितियों में यह पूजा 7 से 10 दिन तक भी ले सकती है जिसके चलते सामान्यतया इस पूजा के आरंभ के दिन को बदल दिया जाता है और इसके समापन का दिन सामान्यतया सोमवार ही रखा जाता है। 

 किसी भी प्रकार की पूजा को विधिवत करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस पूजा के लिए निश्चित किए गए मंत्र का एक निश्चित संख्या में जाप करना और यह संख्या अधिकतर पूजाओं के लिए 125,000 मंत्र होती है । चन्द्र पूजा में भी चन्द्र वेद मंत्र का 125,000 बार जाप करना अनिवार्य होता है। 

पूजा के आरंभ वाले दिन पांच या सात पंडित पूजा करवाने वाले यजमान यानि की जातक के साथ भगवान शिव के शिवलिंग के समक्ष बैठते हैं और शिव परिवार की विधिवत पूजा करने के बाद मुख्य पंडित यह संकल्प लेता है कि वह और उसके सहायक पंडित उपस्थित यजमान के लिए चन्द्र वेद मंत्र का 125,000 बार जाप एक निश्चित अवधि में करेंगे और इस जाप के पूरा हो जाने पर पूजन, हवन और कुछ विशेष प्रकार के दान आदि करेंगे। जाप के लिए निश्चित की गई अवधि सामान्यतया 7 से 10 दिन होती है। 

संकल्प के समय मंत्र का जाप करने वाली सभी पंडितों का नाम और उनका गोत्र बोला जाता है और इसी के साथ पूजा करवाने वाले यजमान का नाम, उसके पिता का नाम और उसका गोत्र भी बोला जाता है, साथ ही जातक द्वारा करवाए जाने वाले चन्द्र वेद मंत्र के इस जाप के फलस्वरूप मांगा जाने वाला फल भी बोला जाता है जो जातक की कुंडली में अशुभ चन्द्र के होने से बनने वाले किसी दोष का निवारण होता है, या चन्द्र ग्रह से शुभ फलों की प्राप्ति करना होता है।

इस संकल्प के बाद सभी पंडित अपने यजमान के लिए चन्द्र वेद मंत्र का जाप करना शुरू कर देते हैं और प्रत्येक पंडित इस मंत्र के जाप को प्रतिदिन लगभग 8 से 10 घंटे तक करता है, जिससे वे इस मंत्र की 125,000 संख्या के जाप को संकल्प के दिन निश्चित की गई अवधि में पूर्ण कर सकें। निश्चित किए गए दिन पर जाप पूरा हो, जाने पर इस जाप और पूजा के समापन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जो लगभग 2 से 3 घंटे तक चलता है। 

“ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्रमसे नम:” अथवा “ॐ सों सोमाय नम:” का जाप करना अच्छे परिणाम देता है। ये वैदिक मंत्र हैं, इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से किया जाता है, यह उतना ही फलदायक होता है। 

इस समापन पूजा के चलते नवग्रहों से संबंधित अथवा नवग्रहों में से कुछ विशेष ग्रहों से संबंधित कुछ विशेष वस्तुओं का दान किया जाता है जो जातकों के लिए अलग-अलग हो सकता है और इन वस्तुओं में चावल, गुड़, चीनी, नमक, गेहूं, दाल, खाद्य तेल, सफेद तिल, काले तिल, जौं और कंबल इत्यादि का दान किया जाता है। इस पूजा के समापन के बाद उपस्थित सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद लिया जाता है, फिर हवन की प्रक्रिया शुरू की जाती है जो जातक और पूजा का फल प्रदान करने वाले देवी देवताओं अथवा ग्रहों के मध्य एक सीधा और शक्तिशाली संबंध स्थापित करती है। 

विधियों के साथ हवन अग्नि प्रज्जवल्लित करने के बाद और हवन शुरू करने के बाद चन्द्र वेद मंत्र का जाप पुन: प्रारंभ किया जाता है और प्रत्येक बार इस मंत्र का जाप पूरा होने पर स्वाहा: का स्वर उच्चारण किया जाता है जिसके साथ ही हवन कुंड की अग्नि में एक विशेष विधि से हवन सामग्री डाली जाती है और यह हवन सामग्री विभिन्न पूजाओं और विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकती है। चन्द्र वेद मंत्र की हवन के लिए निश्चित की गई जाप संख्या के पूरे होने पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण मंत्रों का उच्चारण किया जाता है और प्रत्येक बार मंत्र का उच्चारण पूरा होने पर स्वाहा की ध्वनि के साथ पुन: हवन कुंड की अग्नि में हवन सामग्री डाली जाती है।

अंत में एक सूखे नारियल को उपर से काटकर उसके अंदर कुछ विशेष सामग्री भरी जाती है और इस नारियल को विशेष मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन कुंड की अग्नि में पूर्ण आहुति के रूप में अर्पित किया जाता है और इसके साथ ही इस पूजा के इच्छित फल एक बार फिर मांगे जाते हैं। जातक को हवन कुंड की 3, 5 या 7 परिक्रमाएं करने के लिए कहा जाता है और यजमान के इन परिक्रमाओं को पूरा करने के बाद और पूजा करने वाले पंडितों का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद यह पूजा संपूर्ण मानी जाती है। 

चन्द्र पूजा के आरंभ होने से लेकर समाप्त होने तक पूजा करवाने वाले जातक को भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। इस अवधि के भीतर जातक के लिए प्रत्येक प्रकार के मांस, अंडे, मदिरा, धूम्रपान और अन्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन निषेध होता है । इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में अपनी पत्नि अथवा किसी भी अन्य स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए और अविवाहित जातकों को किसी भी कन्या अथवा स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। जातक को इस अवधि में किसी भी प्रकार का अनैतिक, अवैध, हिंसात्मक और घृणात्मक कार्य आदि भी नहीं करना चाहिए। जातक को प्रतिदिन मानसिक संकल्प के माध्यम से चन्द्र पूजा के साथ अपने आप को जोड़ना चाहिए और प्रतिदिन स्नान करने के बाद जातक को इस पूजा का समरण करके यह संकल्प करना चाहिए कि चन्द्र पूजा उसके लिए अमुक स्थान पर अमुक संख्या के पंडितों द्वारा चन्द्र वेद मंत्र के 125,000 संख्या के जाप से की जा रही है और इस पूजा का विधिवत और अधिकाधिक शुभ फल उसे प्राप्त होना चाहिए। ऐसा करने से जातक मानसिक रूप से चन्द्र पूजा के साथ जुड़ जाता है और जिससे इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल और भी अधिक शुभ हो जाते हैं।

यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि चन्द्र पूजा जातक की अनुपस्थिति में भी की जा सकती है और जातक के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की स्थिति में इस पूजा में जातक की तस्वीर अर्थात फोटो का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ साथ जातक के नाम, उसके पिता के नाम और उसके गोत्र आदि का प्रयोग करके जातक के लिए इस पूजा का संकल्प किया जाता है। इस संकल्प में यह कहा जाता है कि जातक किसी कारणवश इस पूजा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में सक्षम नहीं है जिसके चलते पूजा करने वाले पंडितों में से ही एक पंड़ित जातक के लिए जातक के द्वारा की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं पूरा करने का संकल्प लेता है और उसके बाद पूजा के समाप्त होने तक वह पंडित ही जातक की ओर से की जाने वाली सारी क्रियाएं करता है जिसका पूरा फल संकल्प के माध्यम से जातक को प्रदान किया जाता है। 

प्रत्येक प्रकार की क्रिया को करते समय जातक की तस्वीर अर्थात फोटो को उपस्थित रखा जाता है और उसे सांकेतिक रूप से जातक ही मान कर क्रियाएं की जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि जातक के स्थान पर पूजा करने वाले पंडित को भगवान शिव को पुष्प अर्थात फूल अर्पित करने हैं तो वह पंडित पहले पुष्प धारण करने वाले अपने हाथ को जातक के चित्र से स्पर्श करता है और उसके बाद उस हाथ से पुष्पों को भगवान शिव को अर्पित करता है और इसी प्रकार सभी क्रियाएं पूरी की जाती हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि व्यक्तिगत रूप से अनुपस्थित रहने की स्थिति में भी जातक को चन्द्र पूजा के आरंभ से लेकर समाप्त होने की अवधि तक पूजा के लिए निश्चित किये गए नियमों का पालन करना होता है भले ही जातक संसार के किसी भी भाग में उपस्थित हो।

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26 Oct, 2018 Blog

Kyo Ki Jati Hai Gowardhan Parvat Ki Parikrama / क्यों की जाती है गोवेर्धन पर्वत की पारिक्रमा

https://youtu.be/wAujibMUruE

क्यों की जाती है गोवेर्धन पर्वत की पारिक्रमा ? 

गोवर्धन परिक्रमा का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। कृष्ण भक्तों के लिए गोवर्धन पर्वत कृष्ण का ही एक रूप है । आज भी गोवर्धन पर्वत चमत्कारी है और वहां जाने वाले हर व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने वाले हर व्यक्ति को जीवन में कभी भी पैसों की कमी नहीं होती है। 
एक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लेने से पहले राधा जी से भी साथ चलने का निवेदन किया।
इस पर राधाजी ने कहा कि उनका मन पृथ्वी पर वृंदावन, यमुना और गोवर्धन पर्वत के बिना नहीं लगेगा। यह सुनकर श्रीकृष्ण ने अपने हृदय की ओर नजर डाली जिससे एक तेज निकल कर रास भूमि पर जा गिरा। यही तेज पर्वत के रूप में परिवर्तित हो गया।
हिन्दू धर्म में मान्यता है कि इसकी परिक्रमा करने से मांगी गई सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। पहाड़ की लोग परि‍क्रमा पूरी करते हैं। हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं को लेकर गोवर्धन आते हैं और 21 कि‍लोमीटर के फेरे लगाते हैं। 

क्यों की जाती है गोवेर्धन पर्वत की परिक्रमा


हम जिसकी परिक्रमा कर रहें हों, उसके चारों ओर घूमते हैं।जब किसी वस्तु पर मन को केन्द्रित करना होता है, तो उसे मध्य में रखा जाता है, वही केन्द्र बिन्दु होता है। अर्थात् जब हम श्रीगिरिराजजी की परिक्रमा करते हैं तो हम उन्हें मध्य में रखकर यह बताते हैं कि हमारे ध्यान का पूरा केन्द्र आप ही हैं और हमारे चित्त की वृत्ति आप में ही है और सदा रहे। दूसरा भावात्मक पक्ष यह भी है कि जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो उसके चारों ओर घूमना हमें अच्छा लगता है, सुखकारी लगता है।
श्रीगिरिराजजी के चारों ओर घूमकर हम उनके प्रति अपने प्रेम और समर्पण का भी प्रदर्शन करते हैं। परिक्रमा का एक कारण यह भी है कि श्रीगिरिराजजी के चारों ओर सभी स्थलों पर श्रीठाकुरजी ने अनेक लीलाएं की हैं जिनका भ्रमण करने से हमें उनकी लीलाओं का अनुसंधान रहता है।

गोवेर्धन पर्वत की परिक्रमा के चार मुख्य नियम होते हैं जिनका पालन करने से परिक्रमा अधिक फलकारी बनती है।

“मुखे भग्वन्नामः, हृदि भगवद्रूपम्,
हस्तौ अगलितं फलम्, नवमासगर्भवतीवत् चलनम्”

अर्थात्, मुख में सतत् भगवत्-नाम, हृदय में प्रभु के स्वरूप का ही चिंतन, दोनों हाथों में प्रभु को समर्पित करने योग्य ताजा फल, और नौ मास का गर्भ धारण किए हुई स्त्री जैसी चाल, ताकि ज्यादा से ज्यादा समय हम प्रभु की टहल और चिंतन में व्यतीत कर सकें। 

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25 Oct, 2018 Blog

Guru Shukra Ki Yuti Sath Layegi Yeh Sukh / गुरु शुक्र की युति साथ लाएगी यह सुख

https://youtu.be/hXd9Ah8L0Lo

गुरु शुक्र की युति साथ लाएगी यह सुख

जिसका गुरु बलवान होता है उसका परिवार समाज एवं हर क्षेत्र में प्रभाव रहता है। शुभ गुरु प्रधान व्यक्ति को सामने देखकर हमारे हाथ अपने आप उन्हें नमस्कार करने के लिए उठ जाते हैं। गुरू जातकों को अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करता है एवं दूसरों की मदद के लिए आगे आने हेतु प्रोत्साहन देता है।

दैत्य गुरु शुक्र को ज्योतिष शास्त्र में जीवन दायनी संजीवनी के ज्ञाता का अधिकार दिया गया है। सौंदर्य पर शुक्र का अधिकार हैं। साथ ही शुक्र सांसारिक ज्ञान भी देता है शुक्र ग्रह एक चमकीला ग्रह हैं, जितने भी जगत में सुंदर पदार्थ हैं उन सभी पर शुक्र का प्रभाव अवश्य देखने को मिलता है। ज्योतिष जगत में शुक्र को सुख का कारक कहा जाता हैं। 

अब जानिए दोनों शुभ ग्रह का आपसी संबंध हमारे जीवन में किस प्रकार फल देते है।

गुरु शुक्र सम्बन्ध
                             दोनों ही ग्रह को गुरु का दर्जा प्राप्त है दोनों ही शुभ ग्रह है। थोड़ी सी समानता के साथ दोनों में बहुत सी असमानताएं है।
गुरु को पुरुष ग्रह विष्णु के प्रतीक तो शुक्र को स्त्री ग्रह लक्ष्मी का प्रतिक माना गया है। एक गुरु दैविक ज्ञान है तो दूसरा रहस्मयी ज्ञान।

अगर ये युति किसी जातक के कुंडली में हो तो उस जातक के चेहरे पर गुरु समान लावण्य व स्वभाव में आकर्षण शक्ति होती है। विपरीत लिंग के व्यक्ति इन जातक से अवश्य प्रभावित हो जाते है।

ये युति जातक को भौतिक सुख को प्राप्त करता है। जातक संसार की सभी भोगों को भोगते हुए भी आध्यत्म की ओर झुकाव रखता है। गुरु जीव का कारक है जो शुक्र के साथ जातक को धर्म व सांसारिक ज्ञान प्रदान करता है, साथ ही जातक की पत्नि भी जातक का भाग्य साथ लेकर आती है। स्त्री कुंडली मे भी जीव शुक्र के साथ गुरु स्त्री सर्वगुण संपन्न बनने में सहायता करता है।

दोनों ग्रह में अगर शुक्र बलवान हो तो गुरु के साथ मिलकर एक आध्यात्मिक व्यक्ति को भौतिकता की ओर ले जाने वाला बन जाता है।
और अगर गुरु बलवान हो जातक की रूचि आध्यत्म की ओर आकर्षित करता है।

चूँकि दोनों निज स्वभाव में भिन्नता के कारण शत्रुता भी रखते है जिस कारण अल्प स्वास्थय सुख व गंभीरता की कमी  देते है, पर यह शत्रुता अल्प मतभेद के बाद भी स्त्री/पुरूष जातक/जातीका को कई विशेष गुण व सौभाग्य प्रदान करती है। शायद यही कारण है गुरु की राशि मीन में शुक्र को उच्च अधिकार प्राप्त होता है।
 

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25 Oct, 2018 Blog

Brahm Muhurt Ka Mahatva / ब्रह्म मुहूर्त का महत्व

https://youtu.be/hvBsVV1pc1Y

ब्रह्म मुहूर्त का महत्व


रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे
ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार
यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में
उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य
की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार
घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में
ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।
“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।
ब्रह्ममुहूर्त की पुण्य का नाश करने
वाली होती है।ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे
विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी।
वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायु मंडल
प्रदूषण रहित होता है। इसी समय वायु मंडल में
ऑक्सीजन  की मात्रा सबसे अधिक होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क
भी स्वस्थ रहता है।
आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से
शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार
होता है। यही कारण है कि इस समय बहने
वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके
अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम
बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम
उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में
भी स्फूर्ति व
ताजगी बनी रहती है। प्रमुख
मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं
तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में
किए जाने का विधान है।
ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ
को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें
तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।
आइये जाने ब्रह्ममुहूर्त का सही वक्त व फायदे

धार्मिक महत्व - व्यावहारिक रूप से यह समय सुबह सूर्योदय से
पहले चार या पांच बजे के बीच माना जाता है। किंतु
शास्त्रों में साफ बताया गया है कि रात के आखिरी प्रहर
का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी तड़के
ही ब्रह्ममुहूर्त होता है। मान्यता है कि इस वक्त
जागकर इष्ट या भगवान की पूजा, ध्यान और पवित्र कर्म
करना बहुत शुभ होता है। क्योंकि इस समय ज्ञान, विवेक, शांति,
ताजगी, निरोग और सुंदर शरीर, सुख और
ऊर्जा के रूप में ईश्वर कृपा बरसाते हैं। भगवान के स्मरण के बाद
दही, घी, आईना, सफेद सरसों, बैल,
फूलमाला के दर्शन भी इस काल में बहुत पुण्य देते हैं।
पौराणिक महत्व - वाल्मीकि रामायण के मुताबिक
माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान
ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे।
जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण
की आवाज सुनी।
व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत,
ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर
समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले
दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर
जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और
हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव
उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।
इस तरह शौक-मौज या आलस्य के कारण देर तक सोने के बजाय इस
खास वक्त का फायदा उठाकर बेहतर सेहत, सुख, शांति और
नतीजों को पा सकते हैं।

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25 Oct, 2018 Blog

Jane Kya Hai Apke Purv Janm Me Karm / कुंडली में शनि से जानिए क्या है आपके पूर्व जन्म में कर्म

https://youtu.be/wTE39Oy89mw

कुंडली में शनि की स्थिति से जानिए, क्या है आपके पूर्व जन्म में कर्म ?

 1. शनि का लग्न या प्रथम स्थान पर होना दर्शाता है कि यह व्यक्ति पूर्वजन्मों में अच्छा वैद्य या पुरानी वस्तुओं जड़ी-बुटी, गूढ़विद्याओं का जानकार रहा होगा। ऐसे व्यक्ति को अच्छी अदृश्य आत्माएं सहायता करती है। इनका बचपन बीमारी या आर्थिक परेशानियों भरा रहता है। ये ऐसे मकान में निवास करते हैं, जहां पर प्रेत आत्माओं का निवास रहता हैं। उनकी पूजा अर्चना करने से लाभ मिता हैं।

2. शनि दूसरे स्थान पर हो, तो माना जाता है, कि ऐसा व्यक्ति पूर्व जन्म में किसी व्यक्ति को अकारण सताने या कष्ट देने से उनकी बददुआ के कारण आर्थिक, शारीरिक परिवारिक परेशानियां भोगता है। राहु का संबंध होने पर नींद नहीं आती या फिर डरावने सपने आते हैं या किसी प्रेत आत्मा की छाया अदृश्य रुप से हर कार्य में रुकावट डालती है। ऐसे व्यक्ति मानसिक रुप से परेशान रहते हैं।

3. शनि या राहु तीसरे या छठे स्थान पर हो, तो अदृश्य आत्माएं भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्वाभास करवाने में मदद करती है। ऐसे व्यक्ति जमीन संबंधी कार्य, घर जमीन के नीचे क्या है, ऐसे कार्य में ज्ञान प्राप्त करते हैं। ये लोग कभी-कभी अकारण भय से पीड़ित पाए जाते हैं।

4. चौथे स्थान पर शनि या राहु पूर्वजों का सर्पयोनी में होना दर्शाता है, जातक को सर्प की आकृति या सर्प से डर लगता है। इन्हें जानवर या सर्प की सेवा करने से लाभ होता है। पेट संबंधी बीमारी के इलाज से सफलता मिलती है।

5. पांचवें स्थान पर शनि या राहु की उपस्थिति पूर्व जन्म में किसी को घातक हथियार से तकलीफ पहुचाने के कारण मानी जाती है। इन्हें संतान संबंधी कष्ट उठाने पड़ते हैं। पेट की बीमारी, संतान देर से होना जैसी परेशानियां रहती हैं।

6. सातवें स्थान पर शनि या राहु होने पर पूर्व जन्म संबंधी दोष के कारण आंख, शारीरिक कष्ट, परिवारिक सुख में कमी महसूस करते हैं । धार्मिक प्रवृत्ति और अपने इष्ट की पूजा करने से लाभ होता है।

7. आठवें स्थान पर शनि या राहु दर्शाता है कि पूर्व जन्म में किसी व्यक्ति पर तंत्र-मंत्र का गलत उपयोग करने से अकारण भय से ग्रसित रहता हैं। इन्हें सर्प चोर मुर्दों से भय बना रहता हैं। इन्हें दूध का दान करने से लाभ होता है।

8. नौवें स्थान पर शनि पूर्व जन्म में दूसरे व्यक्तियों की उन्नति में बाधा पहुंचाने का दोष दर्शाता है। ऐसे व्यक्ति नौकरी में विशेष उन्नति नहीं कर पाते हैं।

9. शनि का बारहवें स्थान पर होना सर्प के आशीर्वाद या दोष के कारण आर्थिक लाभ या नुकसान होता है। ऐसे व्यक्ति को सर्पाकार चांदी की अंगूठी धारण करनी चाहिए ऐसे लोग सर्प की पूजा करने से लाभान्वित होते हैं। भगवान शंकर पर दूध पानी चढ़ाने से भी लाभ मिलता है।

10. जन्म पत्रिका के किसी भी घर में राहु और शनि की युति है, ऐसा व्यक्ति बाहर की हवाओं से पीड़ित रहता है। इनके शरीर में हमेशा भारीपन रहता है, पूजा अर्चना के वक्त उवासी आना, आलसी प्रवृत्ती, क्रोधी होने जैसे दोष होते हैं। 
 

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25 Oct, 2018 Blog

राजयोग से मिलेगा मान सम्मान / Rajyog Se Milega Maan Sammaan

https://youtu.be/28ISAcR2ljA

राजयोग से मिलेगा मान सम्मान

राजयोग सभी योगों का राजा कहलाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ विशेषता अवश्‍य मिल जाती है। अलग-अलग सन्दर्भों में राजयोग के अलग-अलग अनेक अर्थ हैं। ऐतिहासिक रूप में योग की अन्तिम अवस्था समाधि' को ही 'राजयोग' कहते थे। किन्तु आधुनिक सन्दर्भ में हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक का नाम 'राजयोग' (या केवल योग) है। ज्योतिष में राजयोग का अर्थ होता है कुंडली में ग्रहों का इस प्रकार से मौजूद होना की सफलताएं, सुख, पैसा, मान-सम्मान आसानी से प्राप्त हो। 

कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। कुंडली के किसी भी भाव में चंद्र-मंगल का योग बन रहा है तो जीवन में धन की कमी नहीं होती है, मान-सम्मान मिलता है, सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। कुंडली में राजयोग का अध्ययन करते वक्त अन्य शुभ और अशुभ ग्रहों के फलों का भी अध्ययन जरुरी है। इनके कारण राजयोग का प्रभाव कम या ज्यादा हो सकता है।

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