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02 Nov, 2018 Blog

Piyaj Lehsun Se Bane Khane KA Bhog Bhulkar Bhi Na Lagaye / प्याज लहसुन से बना खाने का भोग भूलकर भी न लगाएं

https://youtu.be/yMA9ReaPO6M

प्याज लहसुन से बना खाने का भोग भूलकर भी न लगाएं

प्याज और लहसुन खाने का स्वाद बढ़ाते हैं| लेकिन  इस जायकेदार भोजन का भोग पूजा के फल को प्रभावित कर सकता है|क्योंकि देवी देवताओं को ये भोग पसंद नहीं है| क्यों नहीं ये समझने के लिए ये कथा सुनें|
बात समुद्र मंथन के समय की है। समुद्र मंथन से जब अमृत निकला तो अमृत पीने के लिए देवताओं व राक्षसों में छीना-झपटी होने लगी। तब मोहिनी रूप धर भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृतपान कराने के उद्देश्य से राक्षसों को भ्रमित कर अमृत बांटना शुरू कर दिया। राहु नामक एक राक्षस को मोहिनी पर जब संदेह हुआ तो वह चुपके देवताओं की पंक्ति में भेष बदल कर बैठ गया। अमृत बांटते बांटते मोहिनी के रूप में भगवान विष्णु भी उस राक्षस को नही पहिचान पाये और उसे भी अमृत दे दिया। परंतु तत्काल सूर्य और चंद्र के पहचानने पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया। सिर कटते ही अमृत की कुछ बूंदें उस राक्षस के मुंह से रक्त के साथ नीचे जमीन में गिरी, जिनसे प्याज और लहसुन की उत्पत्ति हुई। अमृत से पैदा होने के कारण प्याज और लहसुन रोगनाशक व जीवनदायिनी है। परंतु राक्षसी रक्त के मिश्रण के कारण इसमें राक्षसी गुणों का समावेश हो गया है। इनके सेवन से शरीर राक्षसों की तरह बलिष्ठ होता है। ये उत्तेजना, क्रोध, हिंसा अशांति व पाप में वृद्धि करते है। इसलिए इसे राक्षसी भोजन माना गया है। रोगनाशक व जीवनदायिनी होने के बाद भी यह पाप को बढ़ाता है और बुद्धि को भ्रष्ट कर अशांति को जन्म देता है। इसलिए प्याज और लहसुन को अपवित्र मान कर इनका धार्मिक कार्यों में प्रयोग वर्जित है तथा देवी-देवताओं को इनका भोग नहीं लगाया जाता।

 

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02 Nov, 2018 Blog

Bulane Se Bhi Nahi Ayegi Laxmi Pehle Kare Ye Kaam / बुलाने से भी नहीं आएगी लक्ष्मी , पहले करें ये काम

https://youtu.be/bq4_eM79XTM

बुलाने से भी नहीं आएगी लक्ष्मी , पहले करें ये काम

दीपावली की पूजा सामान्य जन में सुख -समृद्धि और धन के लिए होती है ।सभी पूजा करके सीधे धन चाहते हैं ,सभी चाहते हैं लक्ष्मी उनके घर आ जाएं और बैठ जाएं ।दुनियाभर के सुख और समृद्धि उन्हें मिल जाए ।इसके लिए दीपावली पर गणेश लक्ष्मी लाकर पूजा करते हैं ।परिणाम कुछ संदिग्ध होता है ,जिसको आने वाले साल कुछ लाभ हुआ वह गणेश ,लक्ष्मी की कृपा मान लिया ,जिसे नहीं हुआ अपने भाग्य को दोष दे लिया ,की जब भाग्य में ही नहीं तो लक्ष्मी गणेश कहाँ से दे देंगे ।है ना हास्यास्पद ,फिर आपकी पूजा का क्या हुआ ,उसका परिणाम कहाँ गया ।कोई नहीं सोचता ।यह हाल सामान्य दिनों में भी होता है जब जहाँ लक्ष्मी पूजा करते हैं |कभी भी परिणाम मिले ही यह जरुरी नहीं होता |कभी कभी लम्बे अनुष्ठान और यहाँ तक की साधना का भी कोई परिणाम नहीं मिलता तथा लक्ष्मी है की आती ही नहीं |
इसमें एक कारण तो यह है कि कुछ भी कर लो मिलेगा उतना ही जितना भाग्य में होगा |दूसरा कारण यह की भाग्य का भी पूरा किसी को नहीं मिलता ।सब कोशिश धन के लिए करते हैं जबकि मिलता भाग्य जितना भी नहीं क्योंकि भाग्य के धन को रोका जाता है नकारात्मक शक्तियों द्वारा ,फिर कितने भी उपाय करो धन के लिए नहीं मिलेगा।तीसरा कारण होता है की सभी सीधे लक्ष्मी को ही बुलाते हैं कोई उनके आने का मार्ग नहीं प्रशस्त करने पर ध्यान देता है |इनके आने में ही बाधा होती है और अगर नकारात्मक ऊर्जा या शक्ति आपके आसपास है तो आ रही लक्ष्मी भी लौट जाती है |चाहिए यह की सबसे पहले उपाय नकारात्मक शक्तियों के लिए करो की भाग्य का तो पूरा मिले।लक्ष्मी के पीछे भागने का कोई फायदा नहीं वो आएगी तब ना जब ये नकारात्मक शक्तियां आने देंगी और रुकावट नहीं बनेंगी ।उपाय करो इन्हें हटाने के ।सीधे लक्ष्मी को बुलाकर कोई फायदा नहीं होता ,उनका मार्ग साफ़ करना जरूरी है जिससे आपके भाग्य में उनकी जितनी मात्रा है वह आ सके ।रास्ता दीजिये वह तो खुद आ जायेगी ,सीधे बुलाइये नहीं उन्हें लाने का प्रयास कीजिये ।पूजने से वह नहीं आएगी प्रयास करने और रास्ता बनाने से वह आएगी ।
अधिकतर ज्योतिषी ,तांत्रिक और पंडित को खुद भाग्य का पूरा नहीं मिलता ,जबकि वह दूसरों को लक्ष्मी प्राप्ति के उपाय बताते फिरते हैं ।रोज अनेक लेख और पोस्ट धन के लिए ,समृद्धि के लिए ,लक्ष्मी के लिए फेसबुक और नेट पर डाले जा रहे ,लोग कर भी रहे पर लाभ शायद किसी किसी को होता हो | बिन नकारात्मक प्रभाव हटाये लक्ष्मी नहीं आ सकती क्योंकि लक्ष्मी एक सात्विक शक्ति हैं जो नकारात्मकता नहीं हटाती ,यह तब आती हैं जब कोई अवरोध न हो |आप नकारात्मकता से घिरे हैं ,मन मलिन है ,स्वास्थ्य सही नहीं है ,शारीरिक असंतुलन है ,विचार सही नहीं अथवा एकाग्र नहीं ,प्रयास कोई भी पूरा नहीं कर पाते ,कोई कार्य ठीक से नहीं होता |घर में कलह है ,न ठीक से निर्णय कर पाते हैं न प्रयास ,हर कार्य में अड़चन आ जाती है ,बनते काम बिगड़ जाते हैं  |अब न आपका प्रयास सही होगा और न लक्ष्मी को साफ़ रास्ता ही मिलेगा |वह आएँगी कहाँ से |भाग्य से आ भी गयी तो स्थिर नहीं रह पाएंगी |जिस गति से आएँगी दुगनी गति से चली जायेंगी और आप हाथ मलते सोचते रहेंगे की धन टिकता क्यों नहीं |
इसलिए उपाय जरूर कीजिये पर अँधेरे को ,नकारात्मकता को ,बाधाओं को हटाने के ,रास्ता साफ कीजिये लक्ष्मी के आने का ,रास्ता बनाइये उन्हें आने के लिए ।रास्ता ही नहीं होगा तो वो आएगी कहाँ से ।सीधे उन्हें बुलाकर क्या होगा ,रास्ता दीजिये वह खुद आ जायेगी ।
लक्ष्मी केवल बुलाने से नहीं आएगी ।बुलाने को तो करोड़ों हाथ रोज उठते हैं ,करोड़ों रोज मंदिरों ,घरों में सर पटकते हैं ,सब लक्ष्मी को ही बुलाते हैं पर कितने के यहाँ आती है।यह दीपावली ,यह सभी पर्व ,नकारात्मकता हटाने ,अँधेरा दूर करने ,साफ़ सफाई और कर्म संयोजित करने के पर्व है ।भयानक अँधेरी रात को दीपक से खुद के लिए राह करने का पर्व है दीपावली ।जगमग तो तब होगा जब कर्म करके ,नकारात्मकता हटाके इसे प्रकाशित करेंगे।बुरी शक्तियों को हटाने का पर्व है होली ,सुरक्षा और नकारात्मकता हटा शक्ति पाने का पर्व है नवरात्र |हर पर्व पर कहीं ना कहीं नकारात्मकता हटाने पर ही क्यों जोर दिया गया है कभी सोचा है |इसलिए की हर बाधा नकारात्मकता से ही आती है और यही मुख्य अवरोध होता है |कोशिश कीजिये अपने अंदर और घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का ।लक्ष्मी आपके भाग्यानुसार खुद आ जायेगी । .
 

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02 Nov, 2018 Blog

In Tithiyon Me Jarur Kare Rudraabhishek Har Mushkile Hongi Dur / इन तिथियों में जरूर करें रुद्राभिषेक हर मुश्किल होगी दूर

https://youtu.be/xGj9DNnOovM

इन तिथियों में जरूर करें रुद्राभिषेक, हर मुश्किल होगी दूर

वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में तो बताया गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काट कर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था।

जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया।

भष्मासुर ने शिव लिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओ से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।

रुद्राभिषेक करने की तिथियांकृष्णपक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।

किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथिमें रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।

कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार मेंआनंद-मंगल होता है।

कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है।

अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।

कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं।

अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।

कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं।

इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।

कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं।

इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।

कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं।

इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।

ज्योर्तिलिंग-

क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है।

वस्तुत:

शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं।

अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं।

स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है।

संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नही है जो हमें रुद्राभिषेक करने या करवाने से प्राप्त नहीं हो सकता है।

 

 

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02 Nov, 2018 Blog

Is Mantra Se Budhimaan Banega Apka Baccha / इस मंत्र से बुद्धिमान बनेगा आपका बच्चा

https://youtu.be/SNNSAUz-WKQ

इस मंत्र से बुद्धिमान बनेगा आपका बच्चा

बुद्धिमता हर कोई चाहता है। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद किसी बच्चे की बुद्धिमता दूसरों से कम ही रह जाती है| ऐसे में एक मंत्र है जो सहायक सिद्ध हो सकता है| इस मंत्र को दिन में तीन बार पूरी श्रद्धा और विशवास के साथ कम से कम 6 महीने लगा तार जपा जाए| तो जपने वाले इंसान की बुद्धि का अत्यंत विकास होता है। 

मन्त्र:-

 || ॐअरपचन धीम स्वाहा ||


विधि:

इस मंत्र को दिन में 3 बार जप करना चाहिए इस मंत्र के जप का समय निर्धारित है और इसमें बदलाव नहीं किया जाना चाहिए।इस मंत्र को तीनों संध्याओं के समय जपा जाना चाहिए। 
पहली संध्या यानि सूर्योदय से पहले जिस समय थोडा दिन और थोड़ी रात हो। 
दूसरी संध्या यानि दोपहर 12 बजे। 
और तीसरी संध्या यानि सूर्यास्त के बाद और रात होने से पहले।

स्नान करके साफ़ कपड़े डालकर एक लाल रंग के कम्बल पर पूर्व दिशा की और मुख करके बैठ जाएँ।रुद्राक्ष की माला लें और ये मंत्र 108 बार पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ जपें। एक समय में 108 बार जपना है। तीनों संध्याओं के समय नहाने कीज़रूरत नहीं है लेकिन सुबह ज़रूर नहाएं।   

नोट: 

अगर यह मंत्र आप किसी और के लिए जप रहे हैं तो पहले मन में संकल्प लीजिए कि इस मंत्र का पूरा लाभ उस व्यक्ति को मिले|

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02 Nov, 2018 Blog

Vaitan Vradhi Kra Sakta Hai Yha Aasaan Upay / वेतन वृद्धि करा सकता है यह आसान उपाय

https://youtu.be/XO_9MV9ClFo

वेतन वृद्धि करा सकता है यह आसान उपाय

शनि देव हमारे कर्मों का फल देने वाले देव माने जाते हैं इसलिए नौकरी में प्रमोशन पाने वाले जातकों को शनिवार के दिन शनि देव की पूरे विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने से उन्हें नौकरी में शीघ्र पदोन्नति प्राप्त होगी। शनि देव की आराधना करने की विधिः

प्रत्येक शनिवार को ब्रह्म मुहूर्त में उठें
इसके बाद सभी नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्नान करें
इसके बाद पूजा स्थल (घर, मंदिर) पर पूजन के लिए विशेष प्रबंध करें
अब पूरे विधि-विधान के साथ पूजा करें
तिल, तेल और छाया पात्र का दान करें
धतूरे की जड़ धारण करें
सात मुखी रुद्राक्ष धारण करें
शनि मंत्र का जाप करें- “ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनिश्चराय नमः”
शनिवार को न करें ये 5 काम, नहीं तो हो जायेंगे बर्बाद !
सूर्य देव की पूजा करें
सूर्य को समस्त ग्रहों का राजा कहा जाता है। यह जातक की कुंडली में सम्मान, सफलता, प्रगति एवं उच्च पदों को प्रदर्शित करता है इसलिए नौकरी में प्रमोशन की कामना करने वाले जातकों को रविवार के दिन सूर्य की आराधना करनी चाहिए। इससे उनके राजयोग का निर्माण होगा। सूर्य की आराधना के लिए विधिः

सूर्योदय से पहले उठें और अपनी नग्न आँखों से उगते हुए सूरज का दर्शन करें
रोज़ाना सुबह-सुबह सूर्य को तांबे के पात्र से जल अर्पित करें
12 मुखी रुद्राक्ष धारण करें
बेल मूल धारण करें
आदित्य हृदयम स्तोत्र का जाप करें
सूर्य यंत्र को विधि विधान से स्थापित करें
सूर्य बीज मंत्र का जाप करें- “ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः”
हनुमान जी की आराधना करें
वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि नौकरी-पेशा  जातकों को जॉब में प्रमोशन नहीं मिल रहा है अथवा उनकी तनख़्वाह में वृद्धि नहीं हो रही है तो उन्हें मंगलवार के दिन हनुमान जी की आराधना करना चाहिए।

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02 Nov, 2018 Blog

Kya Chandra Grahan Dosh Ka Prabhav / क्या चंद्र ग्रहण दोष का प्रभाव

https://youtu.be/MiLIiYxlkx0

क्या चंद्र ग्रहण दोष का प्रभाव

जब चंद्रमा के साथ राहू की युक्ति हो रही हो तो ऐसी अवस्था को चंद्र दोष माना जाता है। इसी अवस्था को चंद्र ग्रहण भी कहा जाता है। दूसरे शब्‍दों में, जब चंद्र के साथ राहु और केतू का नकारात्‍मक गठन, चंद्र ग्रहण दोष कहलाता है। ग्रहण दोष का प्रभाव राशियों पर पड़ता है, जिसके लिए जन्‍मकुंडली, ग्रहों की स्थिति भी मायने रखती है|

चंद्र ग्रहण दोष के कारण - 

चंद्र ग्रहण दोष के कई कारण होते हैं और हर व्‍यक्ति के जीवन पर उसका प्रभाव भी अलग तरीके से पड़ता है। चंद्र ग्रहण दोष का सबसे अधिक प्रभाव, उत्‍तरा भादपत्र नक्षत्र में पड़ता है। जो जातक, मीन राशि का होता है और उसकी कुंडली में चंद्र की युति राहु या केतू के साथ स्थित हो जाएं, ग्रहण दोष के कारण स्‍वत: बन जाते हैं। ऐसे व्‍यक्तियों पर इसके प्रभाव अधिक गंभीर होते हैं।

राहु, राशि के किसी भी हिस्‍से में चंद्र के साथ पाया जाता है- जबकि केतू समान राशि में चंद्र के साथ पाया जाता है

  • राहु, चंद्र महादशा के दौरान ग्रहण लगाते हैं 
  • चंद्र ग्रहण के दिन बच्‍चे को स्‍नान अवश्‍य कराएं।

चंद्र ग्रहण दोष का पता लगाने के सबसे पहले जन्‍मकुंडली का होना आवश्‍यक होता है, इस जन्‍मकुंडली में राहु और केतू की दशा को पंडित के द्वारा पता लगाया जा सकता है। या फिर नवमासा या द्वादश मास चार्ट को देखकर भी दोष को जाना जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि पिछले जन्‍म के कर्मों के कारण वर्तमान जन्‍म में चंद्र ग्रहण दोष लगता है।

चंद्र ग्रहण दोष के प्रभाव-  

चंद्र दोष अपने स्वयं के बुरे प्रभावों के रूप में यह व्यक्ति अनावश्यक तनाव का एक बहुत कुछ देता है। विश्वास, भावनात्मक अपरिपक्वता, लापरवाही, याददाश्त में कमी, । स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं को बहुत हद तक अनुकूल हैं। 

जिन व्यक्तियों का चन्द्रमा क्षीण होकर अष्टम भाव में और चतुर्थ तथा चंद्र पर राहु का प्रभाव हो, अन्य शुभ प्रभाव न हो तो वे मिरगी रोग का शिकार होते हैं। 

जिन लोगों का चन्द्रमा छठे आठवें आदि भावों में राहु दृष्ट न हो, वैसे पाप दृष्ट हो तो उनको रक्त चाप आदि होता है।   

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02 Nov, 2018 Blog

Jyotish Me Fhal Kathan Ke Niyam / ज्योतिष में फल कथन के नियम

https://youtu.be/eFmCG7EiuxE

ज्योतिष में फल कथन के नियम

ज्योतिष में फलकथन करने से पूर्व विचार करने योग्य बातें-

  • किसी भी ग्रह की महादशा में उसी ग्रह की अन्तर्दशा अनुकूल फल नहीं देती।
  • योगकारक ग्रह की महादशा में पापी या मारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में शुभ फल तथा उत्तरार्द्ध में अशुभ फल देने लगता है।
  • अकारक ग्रह की महादशा में कारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में अशुभ तथा उत्तरार्द्ध में शुभ फल की प्राप्ति होती है।
  • भाग्य स्थान का स्वामी यदि भाग्य भाव में बैठा हो और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो ऐसा व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली माना जाता है।
  • लग्न का स्वामी सूर्य के साथ बैठकर विशेष अनुकूल रहता है।
  • सूर्य के समीप इन अंशो तक जाने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं, (चन्द्र-१२ अंश, मंगल-१७ अंश, बुध-१३ अंश, गुरु-११ अंश, शुक्र-९ अंश, शनि-१५ अंश) फलस्वरूप ऐसे ग्रहों का फल शून्य होता है। अस्त ग्रह जिन भावों के अधिपति होते हैं उन भावों का फल शून्य ही समझना चाहिए।
  • सूर्य उच्च का होकर यदि ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली तथा पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तित्व होता है।
  • सूर्य और चन्द्र को छोड़कर यदि कोई ग्रह अपनी राशि में बैठा हो तो वह अपनी दूसरी राशि के प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।
  • किसी भी भाव में जो ग्रह बैठा है, इसकी अपेक्षा जो ग्रह उस भाव को देख रहा होता है, उसका प्रभाव ज़्यादा रहता है।
  • जिन भावों में शुभ ग्रह बैठे हों या जिन भावों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो वे भाव शुभ फल देने में सहायक होते हैं।
  • एक ग्रह दो भावों का अधिपति होता है। ऐसी स्थिति में वह ग्रह अपनी दशा में लग्न से गिनने पर जो राशि पहले आएगी उसका फल वह पहले प्रदान करेगा।
  • दो केन्द्रों का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण के स्वामी के साथ बैठे हैं तो उसे केंद्रत्व दोष नहीं लगता और वह शुभ फल देने में सहायक हो जाता है। सामान्य नियमों के अनुसार यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो वह अशुभ फल देने लग जाता है चाहे वह जन्म-कुंडली में करक ग्रह ही क्यों न हो।
  • अपने भाव से केन्द्र व त्रिकोण में पड़ा हुआ ग्रह शुभ होता है।
  • केंद्र के स्वामी तथा त्रिकोण के स्वामी के संबंध हो तो वे एक दूसरे की दशा में शुभ फल देते हैं। यदि संबंध न हो तो एक की महादशा में जब दूसरे की अंतर्दशा आती है तो अशुभ फल ही प्राप्त होता है।
  • वक्री होने पर ग्रह अधिक बलवान हो जाता है तथा वह ग्रह जन्म-कुंडली में जिस भाव का स्वामी है, उस भाव को विशेष फल प्रदान करता है।
  • यदि भावाधिपति उच्च, मूल त्रिकोणी, स्वक्षेत्री अथवा मित्रक्षेत्री हो तो शुभफल करता है।
  • यदि केन्द्र का स्वामी त्रिकोण में बैठा हो या त्रिकोण केंद्र में हो तो वह ग्रह अत्यन्त ही श्रेष्ठ फल देने में समर्थ होता है। जन्म-कुंडली में पहला, पाँचवा तथा नवाँ भाव त्रिकोण स्थान कहलाते हैं। परन्तु कोई ग्रह त्रिकोण में बैठकर केंद्र के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करता है तो वह न्यून योगकारक ही माना जाता है।
  • त्रिक स्थान (कुंडली के 6, 8, 12 वे भाव को त्रिक स्थान कहते हैं) में यदि शुभ ग्रह बैठे हो तो त्रिक स्थान को शुभ फल देते हैं परन्तु स्वयं दूषित हो जाते हैं और अपनी शुभता खो देते हैं।
  • यदि त्रिक स्थान में पाप ग्रह बैठे हों तो त्रिक भावों को पापयुक्त बना देते हैं पर वे ग्रह स्वयं शुभ रहते हैं और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं।
  • चाहे अशुभ या पाप ग्रह ही हो, पर यदि वह त्रिकोण भाव में या त्रिकोण भाव का स्वामी होता है तो उसमे शुभता आ जाती है।
  • एक ही त्रिकोण का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण भाव में बैठा हो तो उसकी शुभता समाप्त हो जाती है और वह विपरीत फल देते है। जैसे पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में हो तो संतान से संबंधित परेशानी रहती है या संतान योग्य नहीं होती।
  • यदि एक ही ग्रह जन्म-कुंडली में दो केंद्रस्थानों का स्वामी हो तो शुभफलदायक नहीं रहता। जन्म-कुंडली में पहला, चौथा, सातवाँ तथा दसवां भाव केन्द्र स्थान कहलाते हैं।
  • शनि और राहु विछेदात्मक ग्रह हैं अतः ये दोनों ग्रह जिस भाव में भी होंगे संबंधित फल में विच्छेद करेंगे जैसे अगर ये ग्रह सप्तम भाव में हों तो पत्नी से विछेद रहता है। यदि पुत्र भाव में हों तो पुत्र-सुख में न्यूनता रहती है।
  • राहू या केतू जिस भाव में बैठते हैं उस भाव की राशि के स्वामी समान बन जाते हैं तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं।
  • केतु जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है उस ग्रह के प्रभाव को बहुत अधिक बड़ा देता है।
  • लग्न का स्वामी जिस भाव में भी बैठा होता है उस भाव को वह विशेष फल देता है तथा उस भाव की वृद्धि करता है।
  • लग्न से तीसरे स्थान पर पापी ग्रह शुभ प्रभाव करता है लेकिन शुभ ग्रह हो तो मध्यम फल मिलता है।
  • तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रहों का रहना शुभ माना जाता जाता है।
  • तीसरे भाव का स्वामी तीसरे में, छठे भाव का स्वामी छठे में या ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे ग्रह पापी नहीं रहते अपितु शुभ फल देने लग जाते हैं।
  • चौथे भाव में यदि अकेला शनि हो तो उस व्यक्ति की वृद्धावस्था अत्यंत दुःखमय व्यतीत होती है।
  • यदि मंगल चौथे, सातवें , दसवें भाव में से किसी भी एक भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति का गृहस्थ जीवन दुःखमय होता है। पिता से कुछ भी सहायता नहीं मिल पाती और जीवन में भाग्यहीन बना रहता है।
  • यदि चौथे भाव का स्वामी पाँचवे भाव में हो और पाँचवें भाव का स्वामी चौथे भाव में हो तो विशेष फलदायक होता है। इसी प्रकार नवम भाव का स्वामी दशम भाव में बैठा हो तथा दशम भाव का स्वामी नवम भाव में बैठा हो तो विशेष अनुकूलता देने में समर्थ होता है।
  • अकेला गुरु यदि पंचम भाव में हो तो संतान से न्यून सुख प्राप्त होता है या प्रथम पुत्र से मतभेद रहते हैं।
  • जिस भाव की जो राशि होती है उस राशि के स्वामी ग्रह को उस भाव का अधिपति या भावेश कहा जाता है। छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी जिन भावों में रहते हैं, उनको बिगाड़ते हैं, किन्तु अपवाद रूप में यदि यह स्वगृही ग्रह हों तो अनिष्ट फल नहीं करते, क्योंकि स्वगृही ग्रह का फल शुभ होता है।
  • छठे भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठेगा, उस भाव में परेशानियाँ रहेगी। उदहारण के लिए छठे भाव का स्वामी यदि आय भाव में हो तो वह व्यक्ति जितना परिश्रम करेगा उतनी आय उसको प्राप्त नहीं सकेगी।
  • यदि सप्तम भाव में अकेला शुक्र हो तो उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन सुखमय नहीं रहता और पति-पत्नी में परस्पर अनबन बनी रहती है।
  • अष्टम भाव का स्वामी जहाँ भी बैठेगा उस भाव को कमजोर करेगा।
  • शनि यदि अष्टम भाव में हो तो उस व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।
  • अष्टम भाव में प्रत्येक ग्रह कमजोर होता है परन्तु सूर्य या चन्द्रमा अष्टम भाव में हो तो कमजोर नहीं रहते।
  • आठवें और बारहवें भाव में सभी ग्रह अनिष्टप्रद होते हैं, लेकिन बारहवें घर में शुक्र इसका अपवाद है क्योंकि शुक्र भोग का ग्रह है बारहवां भाव भोग का स्थान है। यदि शुक्र बारहवें भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति अतुलनीय धनवान एवं प्रसिद्ध व्यक्ति होता है।
  • द्वादश भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठता है, उस भाव को हानि पहुँचाता है।
  • दशम भाव में सूर्य और मंगल स्वतः ही बलवान माने गए हैं, इसी प्रकार चतुर्थ भाव में चन्द्र और शुक्र, लग्न में बुध तथा गुरु और सप्तम भाव में शनि स्वतः ही बलवान हो जाते हैं तथा विशेष फल देने में सहायक होते हैं।
  • ग्यारहवें भाव में सभी ग्रह अच्छा फल करते हैं।
  • अपने स्वामी ग्रह से दृष्ट, युत या शुभ ग्रह से दृष्ट भाव बलवान होता है।
  • किस भाव का स्वामी कहाँ स्थित है तथा उस भाव के स्वामी का क्या फल है, यह भी देख लेना चाहिए। यदि कोई ग्रह जिस राशि में है उसी नवमांश में भी हो तो वह वर्गोत्तम ग्रह कहलाता है और ऐसा ग्रह पूर्णतया बलवान माना जाता है तथा श्रेष्ठ फल देने में सहायक होता है।
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02 Nov, 2018 Blog

Agar Apki Kundali Me Hai Ye Yog To Apko Milegi Sundar Patni / अगर आपकी कुंडली में हैं ये योग तो आपको मिलेगी सुंदर पत्नी

https://youtu.be/ZE6R5q51118

अगर आपकी कुंडली में हैं ये योग, तो आपको मिलेगी सुंदर पत्नी

  • जब सप्तमेश सौम्य ग्रह हो तथा स्वग्रही होकर सप्तम भाव में ही हो तो जातक को सुन्दर, आकर्षक, सौभाग्यशाली पत्नी मिलती है।
  • जब सप्तमेश सौम्य ग्रह हो कर भाग्य भाव अर्थात नौवें भाव  में हो, तो जातक को सुंदर-सुशील पत्नी मिलती है तथा जातक का विवाह के बाद भाग्योदय होता है।
  • सप्तमेश एकादश भाव में हो तो जातक की पत्नी रूपवती,संस्कारयुक्त मृदुभाषी व सुन्दर होती है तथा विवाह के बाद जातक की आय में वृद्वि होती है, और पत्नी के माध्यम से आर्थिक लाभ मिलता है।    
  • यदि जातक की कुंडली में सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि हो, तो जातक को चतुर,मृदभाषी,सुन्दर,सुशिक्षत,संस्कारवान, तीखे, कला आदि में दक्ष,भावुक एवं काम कला में प्रवीण पत्नी मिलती है।
  • कुंडली के सप्तम भाव में मिथुन या कन्या राशि हो तो जातक को आर्कषक व्यक्तित्व वाली सौभाग्यशाली,श्रृंगारप्रिय और कठिन समय में पति का साथ देने वाली पत्नी प्राप्त होती है।        
  • जिस जातक के सप्तम भाव में कर्क राशि हो उसे अति सुन्दर लम्बे कद वाली,भावुक,छरहरी तथा तीखे नयन नक्श वाली सौभाग्यशाली पत्नी मिलती है।
  • जिस जातक की कुंडली के सप्तम भाव में कुंभ राशि हो ऐसे जातक की पत्नी गुणों से युक्त से धार्मिक,अध्यात्मिक कार्यो में गहरी अभिरूचि रखने वाली पत्नी होती है।  
  • सप्तम भाव में धनु या मीन राशि होने पर जातक को धार्मिक,अध्यात्मिक एवं पुण्य के कार्यो में रूचि रखने वाली पत्नी मिलती है।
  • जातक की कुंडली में सप्तमेश केन्द्र में हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो जातक को गुणवान,सुन्दर एवं सुशील पत्नी मिलती है।                  
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01 Nov, 2018 Blog

Bharni Nakshatra Me Aise Kare Tarpan / भरणी नक्षत्र में ऐसे करें तर्पण

https://youtu.be/CqvmwZY8N20

भरणी नक्षत्र में ऐसे करें तर्पण

कई लोग अपने जीवन में कोई भी तीर्थ यात्रा नहीं कर पाते। ऐसे लोगों की मृत्यु होने पर उन्हें मातृगया, पितृगया, पुष्कर तीर्थ और बद्रीकेदार आदि तीर्थों पर किए गए श्राद्ध का फल मिले, इसके लिए भरणी श्राद्ध किया जाता है। अबके यह भरणी श्राद्ध दि. 28 सितंबर को किया जायेगा। उस दिन भरणी नक्षत्र होगा। 

भरणी श्राद्ध पितृपक्ष के भरणी नक्षत्र के दिन किया जाता है। यह एकोदिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है। व्यक्ति के निधन के पहले वर्ष में भरणी श्राद्ध नहीं किया जाता है।

इसका कारण है कि प्रथम वार्षिक वर्षश्राद्ध होने तक मृत व्यक्ति को प्रेतत्व रहता है। ऐसे में पहले वर्ष किसी भी श्राद्ध का अधिकार नहीं होता। ऐसा होने पर भी आग्रहपूर्वक पहले वर्ष भरणी श्राद्ध संपन्न किया जाता है। हालांकि इसके लिए कोई ठोस शास्त्राधार नहीं है।

प्रथम वर्ष के बाद भरणी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। वास्तव में भरणी श्राद्ध प्रतिवर्ष करने का शास्त्र संकेत देते हैं। किंतु एक ही बार करने वाले व्यक्ति कम से कम प्रथम वर्ष भरणी श्राद्ध न करें।

प्रत्येक वर्ष भरणी श्राद्ध करना हमेशा श्रेयस्कर रहता है। इसे प्रथम महालय में न करते हुए दूसरे वर्ष से अवश्य करें।

नित्य तर्पण में मृत व्यक्ति को पितृत्व का अधिकार प्राप्त होने पर ही उसके नाम का उच्चारण करें। इसे पहले साल न करें। हालांकि कुछ पुरोहितों के मतानुसार सपिंडीकरण तथा षोडशमासिक श्राद्ध आदि सभी विधि की तरह भरणी श्राद्ध भी करवा सकते हैं। तो कोई दोष नहीं है।

 

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01 Nov, 2018 Blog

Ghar Se Hata De Berkar Saman Ho Sakta Hai Vastu Dosh / घर से हटा दें बेकार समान, हो सकता है ये वास्तु दोष

https://youtu.be/4-XyzCjxCsM

घर से हटा दें बेकार समान, हो सकता है ये वास्तु दोष

वास्तु शब्द का अर्थ होता है ऐसी जगह जहां पंचतत्वों का वास हो। वास यानि वह स्थान जहां किसी भी प्रकार की जड़ चेतन का निर्माण किया गया हो, वास्तु विज्ञान कहलाता है। हर वह जगह जहां चार दीवार हो, वहां वास्तु पुरुष का वास होता है।

वास्तु दोष किसी भी जगह हो सकता है चाहे आपके लेखन कार्य करने की टेबल ही क्योंकि न हो। वास्तु दोष का निर्माण हम स्वयं अपनी गलतियों से करते हैं। बिना जरूरत के सामान को भी जोड़ कर रखना। किसी तरह का काम करने के बाद सामान या औजार इधर-उधर रखना। फिर दौबारा जरूरत पड़ने पर चिखना-चिल्लाना और सबको परेशान कर देना। इन सभी कारणों से वास्तु दोष बनता है।

घर को साफ रखें सभी जरूरत की चीज सम्भाल कर उनके स्थान पर रखें। गैरजरूरी वस्तुओं को घर से निकाल दें, या कबाड़ी वाले को बेच दें। सभी प्रकार की परेशानियों मुख्य कारण यही है।

वास्तुपुरुष की पौराणिक कथा

मत्स्यपुराण भगवान शिव ओर अंधकासुर नामक राक्षस के युद्ध की बात लिखी हुई है कि इस युद्ध में थकान के कारण भगवान शिव के पसीने की एक बूंद धरातल पर गिरने से एक भयंकर भूत उत्पन्न हुआ।

इसका प्रकोप इतना भयानक था कि समस्त देव डरते हुए ब्रह्माजी से इस विपत्ति से बचाने के लिए कहने लगे तब ब्रह्मा जी ने उन्हें कहाँ आप सब मिलकर इसे अधोमुख दबोच लो और उसके बाद इसे पृथ्वी पर फैंक दो।ऐसा करने से आपका भय हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा, और इस महाभूत को वास्तुपुरुष का नाम दिया। तथा वास्तुपुरुष को कहा कि आप पर जो भी निर्माण कार्य चाहे वो मकान, दूकान, नगर, गांव, मंदिर, तालाब इत्यादि का निर्माण कार्य मनुष्य करना चाहते हैं तो सबसे पहले तुम्हारी पूजा नहीं करता हैं तो वह शीघ्र ही दरिद्रता को पायेगा या मृत्यु हो जाएगी। विश्वकर्मा प्रकाश में भी वास्तुपुरुष के विषय में लिखा गया है कि वह पृथ्वी पर अधोमुख होकर शयन करते हैं और इसके चारों तरफ अनेकों देवताओं का वास है।

वास्तु पुरुष की तीन अवसरों पर पूजा अर्चना करनी चाहिए।
  • निर्माण कार्य में शिलान्यास करते समय ।
  • दूसरी बार मुख्य द्वार लगाते समय ।
  • तीसरी बार गृह प्रवेश के समय पूजा करनी चाहिए।

गृह प्रवेश उस समय होना चाहिए, जब वास्तुपुरुष की नजर शुभ फल देने वाली दिशा की तरफ हो।

वास्तु दोष होने पर सबसे ज्यादा परेशानी परिवार के मुखिया को झेलनी पड़ती है। ऐसा मान-सम्मान, रोग आदि के रूप मे हो सकता है।वह स्थान जहां जनजीवन होता है, वहीं वास्तुपुरुष का वास भी होता है। ज्योतिष शास्त्र का संबंध समयानुसार है, और वास्तु शास्त्र का दिशाओं से।

वास्तु 3 प्रकार के होते हैं ।

घरेलू, व्यापारिक और मंदिर।

वास्तु दोष के मुख्य कारक

पंचतत्वों : पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश।

त्रिदोष : वात्त, पित्त और कफ।

त्रिगुण : सत्व, रजस और तमस।

वास्तु दोष का निवारण इनके द्वारा ही किया जाता है।पृथ्वी तत्व की परेशानी हो, तो जल तत्व बढाएं। यानि पहला तत्व हर तीसरे तत्व का अवरोधक होता है।जिस दिशा में दोष हो वहां कोई दैविक चिंह लगाना चाहिए।

वात्त के लिए जल और वायु को बढ़ाएं। पित्त संबंधी परेशानी के लिए जल तत्व बढ़ा देना चाहिए। कफ की परेशानी हो, तो अग्नि बढ़ाएं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हम

40% जन्म समयानुसार,

20% वंशानुसार,

20% कर्मानुसार, और

20% वास्तु दोष रहित वातावरण अनुसार जीवन जीते हैं।

जन्म समय और वंशज होना प्राकृति के हाथ में है यानि 60% हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन सदकर्म और अच्छे वास्तु वाले वातावरण में रहने से हमें 40% अपने आज को ठीक करने का मौका मिलता है।

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