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15 Oct, 2018 Blog

Asht Kali Naam Me Chuppa Hai Yaha Rahasya / अष्ट काली नाम में छुपा है यह रहस्य

https://youtu.be/m3DuX4bE6_M

अष्ट काली नाम में छुपा है यह रहस्य

दस महा-

विद्याओं में देवी काली, उग्र तथा सौम्य रूप में विद्यमान हैं, देवी काली अपने अनेक अन्य नमो से प्रसिद्ध हैं, जो भिन्न-भिन्न स्वरूप तथा गुणों वाली हैं।

देवी काली मुख्यतः

आठ नामों से जानी जाती हैं और 'अष्ट काली', समूह का निर्माण करती हैं।

  •  चिंता मणि काली
  • स्पर्श मणि काली
  • संतति प्रदा काली
  • सिद्धि काली
  • दक्षिणा काली
  • कामकला काली
  • हंस काली
  • गुह्य काली

देवी काली 'दक्षिणा काली' नाम से ज्यादा जगहों पर पूजी जाती है। उनका नाम 'दक्षिणा काली' क्यों पड़ा, ये भी बहुत रोमांचक है। 
कहा जाता है कि सर्वप्रथम 'दक्षिणा मूर्ति भैरव' ने इन की उपासना की, परिणामस्वरूप देवी, दक्षिणा काली के नाम से विख्यात हुई।
दक्षिण दिशा की ओर रहने वाले 'यम या धर्म राज, देवी का नाम सुनते ही भाग जाते है परिणामस्वरूप देवी, दक्षिणा काली के नाम से जानी जाती हैं। तात्पर्य है, मृत्यु के देवता यम-राज जिनका राज्य या यम लोक दक्षिण दिशा में विद्यमान है, मृत्यु पश्चात जीव-आत्मा यम दूतों द्वारा इन्हीं के लोक में लाई जाती हैं जहाँ जीव के कर्म-अनुसार उसे दण्डित किया जाता हैं तथा अगले जन्म का निर्धारण होता हैं। यम राज तथा उनके दूत, देवी काली के भक्तों से दूर रहते है, मृत्यु पश्चात यम दूत उन्हें यम लोक नहीं ले जाते हैं।
समस्त प्रकार के साधनाओं का सम्पूर्ण फल 'दक्षिणा' से ही प्राप्त होता हैं, जैसे गुरु दीक्षा तभी सफल हैं जब गुरु दक्षिणा दी गई हो। देवी काली, मनुष्य को अपने समस्त कर्मों का फल प्रदान करती हैं या सिद्धि प्रदान करती हैं, तभी देवी को दक्षिणा काली के नाम से भी जाना जाता हैं।
देवी काली वार प्रदान करने में अत्यंत चतुर हैं, यहाँ भी एक कारण हैं की उन्हें दक्षिणा काली कहा जाता हैं।
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, पुरुष को ‘दक्षिण’ तथा स्त्री को ‘बामा’ कहा जाता हैं। वही बामा दक्षिण पर विजय पाकर मोक्ष प्रदान करने वाली होती हैं, कारणवश देवी अपने भैरव के ऊपर खड़ी हैं।
देवी काली दो कुल, जो 'रक्त तथा कृष्ण' वर्ण में अधिष्ठित हैं, कृष्ण या काले स्वरूप वाली 'दक्षिणा' कुल से तथा रक्त या लाल वर्ण वाली 'सुंदरी' कुल से सम्बंधित हैं। मुख्यतः विध्वंसक प्रवृत्ति धारण करने वाले समस्त देवियाँ 'कृष्ण या दक्षिणा कुल' से सम्बंधित हैं। देवी काली का घनिष्ठ सम्बन्ध विध्वंसक प्रवृत्ति तथा तत्वों से हैं, जैसे देवी श्मशान वासी हैं, मानव शव-हड्डी इत्यादि मृत देह से सम्बंधित तत्त्वों से सम्बद्ध हैं। भूत-प्रेत इत्यादि प्रेत योनि को प्राप्त जीवों या विध्वंसक सूक्ष्म परा जीव, देवी के संगी साथी तथा सहचरी हैं। यहाँ देवी नियंत्रक भी हैं तथा स्वामी भी, समस्त भूत-प्रेत इत्यादि, इनकी आज्ञा का उलंघन कभी नहीं कर सकते। समस्त वेद इन्हीं देवी की भद्र काली रूप में बताते हैं। निष्काम या निःस्वार्थ भक्तों के माया रूपी पाश को ज्ञान रूपी तलवार से काट कर मुक्त करती हैं।

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15 Oct, 2018 Blog

Yaha Hai Mahakali Ke Mandir Banne Ki Katha / यह है महाकाली के मंदिर बनने की कथा

https://youtu.be/-OO_lLtAG4Q

यह है महाकाली के मंदिर बनने की कथा

देवी काली की आराधना, पूजा भारत के पूर्वी प्रांत में बहुत लोकप्रिय हैं, देवी वहां समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा पूजिता हैं, खासकर जनजातीय, निम्न जाति तथा युद्ध कौशल से सम्बंधित समाज की देवी अधिष्ठात्री हैं। जहां-तहा देवी काली के मंदिर देखे जा सकते हैं, प्रत्येक श्मशान में देवी काली का मंदिर विद्यमान हैं तथा विशेष तिथियों में पूजा, अर्चना होती हैं। चांडाल जो की हिन्दू धर्म के अनुसार, श्मशान में शव के दाह का कार्य करते हैं एवं अन्य शूद्र जातियों की देवी अधिष्ठात्री हैं। डकैती जैसे अमानवीय कृत्य करने वाले भी देवी की विशेष पूजा करते हैं, सामान्यतः डकैत, डकैती करने हेतु प्रस्थान से पहले देवी काली की विशेष पूजा आराधना करते थे। देवी का सम्बन्ध क्रूर कृत्यों से भी हैं, परन्तु यह क्रूर कृत्य पूर्व तथा वर्तमान जन्म में अर्जित के दुष्ट कर्म के जातकों हेतु ही हैं। हिन्दू धर्म पुनर्जन्म के सिद्धांतों पर आधारित हैं, केवल मानव देह धरी या जातक को अपने नाना जन्मो के कुकर्मों के कारण कष्ट-दुःख तथा सुकर्मों के कारण सुख भोगना ही पड़ता हैं।

पहले के समय में डकैत, देवी के निमित्त भव्य मंदिरों का निर्माण करवाते थे तथा विधिवत पूजा आराधना की संपूर्ण व्यवस्था करते थे। आज भी भारत वर्ष के विभिन्न प्रांतों में ऐसे मंदिर विद्यमान हैं, जहां डकैत देवी काली की आराधना, पूजा इत्यादि करते थे। हुगली जिले में डकैत काली-बाड़ी, जलपाईगुड़ी जिले की देवी चौधरानी (डकैत) काली बाड़ी इत्यादि, प्रमुख डकैत देवी मंदिर हैं।

स्कन्द (कार्तिक) पुराण, के अनुसार 'देवी आद्या शक्ति काली' की उत्पत्ति आश्विन मास की कृष्णा चतुर्दशी तिथि मध्य रात्रि के घोर में अंधकार से हुई थीं। परिणामस्वरूप अगले दिन कार्तिक अमावस्या को उन की पूजा-आराधना तीनों लोकों में की जाती हैं, यह पर्व दीपावली या दीवाली नाम से विख्यात हैं तथा समस्त हिन्दू समाजों द्वारा मनाई जाती हैं। शक्ति तथा शैव समुदाय का अनुसरण करने वाले इस दिन देवी काली की पूजा करते हैं तथा वैष्णव समुदाय महा लक्ष्मी जी की, वास्तव में महा काली तथा महा लक्ष्मी दोनों एक ही हैं। भगवान विष्णु के अन्तः कारण की शक्ति या संहारक शक्ति 'मायामय या आदि शक्ति' ही हैं, महालक्ष्मी रूप में देवी उनकी पत्नी हैं तथा धन-सुख-वैभव की अधिष्ठात्री देवी हैं।

अग्नि तथा गरुड़ पुराण के अनुसार महा-काली की साधना-आराधना, युद्ध में सफलता और शत्रुों पर विजय प्राप्त करने के हेतु की जाती हैं।

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15 Oct, 2018 Blog

Aao Tantra Vigyan Ko Samjhe / आओ तंत्र विज्ञान को समझें

https://youtu.be/cpgwefTV-Qs

आओ तंत्र विज्ञान को समझें

अपने कल्याण के लिऐ मनुष्य देव-पूजा करते हैं, लेकिन अक्सर आपने देखा होगा कि पूजा और साधना की कलयुगी अंधाधुंध दौड़ में लोग अपने भारी अनिष्ट को भी अज्ञानता में पूजे जा रहे हैं। किसी पूजा से वो अपने विनाश को आमंत्रण दे रहे हैं, ये उन्हें पता ही नहीं होता।

 सभी देवी-देवता कल्याणकारी होते हैं, लेकिन सभी देव कुछ विशेष तत्वों के ही प्रदाता हैं और उसी तत्व की वृद्धि भी करते हैं, और उसके विरोधी तत्व को नष्ट करते हैं । ये सिद्धांत है देव कृपा का और इसी वैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर अज्ञानता बस आपको विनाश की भी प्राप्ति हो सकती है।

जैसे :-

आप काफी मोटे हैं , चर्बी बढ़ रही है, वीपी हाई है, और लक्ष्मी जी या कुवेर की आराधना (पूजन) कर रहे हैं तो धन-संपदा तो ठीक होगी, मगर आप अकालमृत्यू को सवयं आमंत्रत कर रहे हैं, क्योंकि इनका मूल कार्य है धन-वृद्धि करना, और शरीर का धन है चर्बी यानि की कैलोरी । आप खुद ही समझ सकते हैं कि उसकी वृद्धि का अंजाम क्या होगा। मृत्यु।। इसीलिए ऐसे लोगों को मां दुर्गा की साधना करनी चाहिए न कि लक्ष्मी जी की।।

अगर कोई अति भावुक या लोभी प्रवृत्ति का है तो सरस्वती पूजन हानिकारक है और कोई अति चंचल स्वभाव और सक्रिय व्यक्ति है तो मां दुर्गा जी का पूजन उचित नहीं है।

अगर आप क्रोधी हैं और भैरव या काली की आराधना करते हैं, तो आप कलह, झगड़े, राजदंड या अकाल मृत्यु को बढ़ावा दे रहे हैं। इन देवों की रौद्रतापूर्ण शक्ति आपके क्रोध को बढ़ाकर आपसे बेहद गलत करवा सकती है।ऐसे लोगों आपको शिव या चंद्र की पूजा करना ही उचित होता है।

प्रत्येक साधना, पूजा, तंत्र, मंत्र, यंत्र, और अनुष्ठान किसी के लिऐ अति लाभदायक होता है और वही किसी के लिए विनाशकारी भी हो सकता है। इसीलिए पहले किसी योग्य ज्योतिष या तंत्रज्ञ गुरू द्वारा अपना सही "इष्ट-देव" जान लें उसके बाद ही उनकी साधना करें, आपके लिए वो पूजा लाभकारी होगी।
 

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15 Oct, 2018 Blog

Vaido Ki Nazar Se Istri Shashaktikaran / वेदों की नजर से स्त्री सशक्तिकरण

https://youtu.be/UoyIwcw0PcA

वेदों की नजर से स्त्री सशक्तिकरण

वैदिक कालीन स्त्री अत्यंत पूजनीय  रही है। स्त्री शब्द को परिभाषित करते हुए महर्षि पतंजलि लिखते है कि (ग्राफिक्स-) स्त्यास्यति अस्याम गर्भ इति स्त्री  अर्थात उसके भीतर गर्भ की स्थिति होने से इसे स्त्री कहते हैं (ग्राफिक्स आउट) । वेदों में नारी को पवित्र कर देने वाली ,विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती,सुख समृद्दि लाने वाली ,विशेष तेज़ वाली देवी, इंद्राणी सबको जगाने वाली उषा आदि अनेक आदर सूचक नामो से   सुशोभित किया गया है। 

अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति,लोपामुद्रा, विश्ववारा ,आत्रेयी आदि ऋषिकाये वैदिक मंत्रों की  द्रष्टा बताई गई है। ये मान्यता शिक्षा में  स्त्री के प्रतिनिधित्व को  दर्शाती है। ऋग्वेद में नारी को ब्राह्मण कहा गया है। इसका अभिप्राय ये है कि स्त्री स्वयं विदुषी होते हुए ही अपनी संतान को  सुशिक्षित बनाती है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में  शचि अपने विषय में कहती है कि मैं ज्ञान में अग्रगण्य हूं,  उच्चकोटि की वक्ता हूं।

अर्थववेद में कहा गया है कि (ग्राफिक्स-)  ब्रह्मचर्येण कन्या युवानम विन्दते पतिम अर्थात ब्रह्मचर्य के पालन से कन्या  उत्तम वर को प्राप्त करे (ग्राफिक्स आउट) । इस प्रकार कन्या के ब्रह्मचारिणी होने के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। अर्थववेद में स्त्री को ही सरस्वती कहा  गया है। इससे ये स्पष्ट है कि सरस्वती के समान अन्य स्त्रियां भी विदुषी बनने का प्रयास करें। अर्थववेद में कहा गया है कि जो  स्त्री ज्ञान का विरोध करने वाली हो उसे सदैव परिवार से दूर रखना चाहिये। इस प्रकार हमारे वेदों में शिक्षा में स्त्रियों की पर्याप्त भागीदारी का संकेत मिलता है। 

वेद पारिवारिक कार्यभार में स्त्री का इतना अधिक महत्व इसलिए  स्वीकार करता है क्योंकि स्त्री उचित अनुचित का सम्यक विचार करके ही कोई निर्णय लेती है। उचित अनुचित का सम्यक निर्णय कर पाना तभी सम्भव है जब स्त्री शिक्षित हो। इससे यह स्पष्ट है कि हमारे वेदों में भी स्त्रियों को पुरुषों के समान शिक्षा ग्रहण करने का विधान है।तैतरीय ब्राह्मण में भी स्त्री शिक्षा के अनेकों संकेत हैं। ऋषियों की भांति ऋषिकाओं के भी तत्वबोधिनी होने के प्रमाण मिलते हैं। अर्थववेद का ब्रह्मचर्य सूक्त शिक्षा पर प्रकाश डालता है। ऋषिकाओं का मंत्र द्रष्टत्व स्त्री शिक्षा का उदघोष करता है। शिक्षा प्राप्त करने के लिए जब बालक बालिकाएं आचार्य के समीप गुरुकुल जाते हैं तब आचार्य उनका उपनयन संस्कार करके उसके गुण कर्म स्वभाव के अनुसार शिक्षा देते थे। इस प्रकार कहा जा सकता  है कि वैदिक काल में भी स्त्रियों को भी पुरुषों के समान शिक्षा  प्राप्ति का पूर्ण अधिकार था।

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15 Oct, 2018 Blog

Janiye Munga Ganesh Dharan Karenge, To Kya Milega Labh / जानिए मूंगा गणेश धारण करेंगे, तो क्या मिलेगा लाभ

https://youtu.be/DMhE6QLAbAI

जानिए मूंगा गणेश धारण करेंगे, तो क्या मिलेगा लाभ   

मूंगा सिंदूरी रंग का एक रत्न होता है। इससे बने श्रीगणेश की प्रतिमा को पूजा स्थान पर स्थापित करने व नित्य पूजा करने से शत्रुओं का डर समाप्त हो जाता है । साथ ही इससे बने श्रीगणेश अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। और क्या लाभ मूंगा गणेश को धारण करने से मिलते है ये भी जान लीजिए।  

  • यदि आपकी कमाई तो बहुत है, लेकिन धन का संचय नहीं हो पा रहा है तो मूंगा गणेश आपके धन को बचाने में मदद करता है।
  • संपत्ति खींचने में मूंगा गणेश चमत्कारिक असर दिखाता है। यदि आप भूमि, भवन, खरीदना चाहते हैं तो मूंगा गणेश धारण करें।
  • शेयर मार्केट, कमोडिटी या अन्य प्रकार के निवेश से लाभ कमाना चाहते हैं तो मूंगा गणेश का प्रयोग किया जा सकता है।
  • जन्म कुंडली में मंगल यदि नीच या पाप ग्रहों से युक्त हो तो मूंगा गणेश पहनने से मंगल के बुरे प्रभाव नष्ट होते हैं।
  • मूंगा के गणेश साहस, बल और नेतृत्व करने की क्षमता प्रदान करते हैं। लीडरशिप करना चाहते हैं तो इसे जरूर धारण करें।
  • शत्रु परेशान कर रहे हों, मुकदमे में जीत हासिल करना चाहते हैं तो मूंगा के गणेश इन सब संकटों से बचाते हैं।
  • हमेशा आलस्य छाया रहता हो, काम में मन नहीं लगता हो मानसिक रूप से तनाव महसूस करते हैं तो मूंगा गणेश धारण करें।
  • मूंगा सबसे अच्छा रक्त शोधक है। यदि आपकी त्वचा खराब है, पिगमेंट की समस्या है, मुहांसे हो रहे हैं तो उसमें मूंगा तुरंत लाभ मिलता है।
मस्तिष्क को नियंत्रण
  • यदि आपमें धैर्य की कमी है, बात-बात पर गुस्सा आ जाता है तो मूंगा धारण करें यह मस्तिष्क को नियंत्रण में रखता है।
  • जन्म कुंडली में मंगल दोष है या मंगल से संबंधित कोई दूसरा दूषित योग बन रहा है तो मूंगा गणेश इनमें राहत प्रदान करता है।
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15 Oct, 2018 Blog

Saptam Bhav Me Shani Ka Prabhav Aur Upay / सप्तम भाव में शनि का प्रभाव और उपाय

https://youtu.be/W8uTVN7Ov0s

सप्तम भाव में शनि का प्रभाव और उपाय

  • सातवें भाव में शनि होतो आदमी कोई भी कार्य शुरू करने के बाद हिम्मत नहीं हारता और धन स्थाई रहता है ।
  • जिस व्यक्ति के सप्तम भाव में शनि होता है वह स्त्री सुख से वंचित रहता है । अगर शनि निर्बल हो या सप्तम भाव पर शुभ स्थानों पर बैठे शुभ ग्रहों की द्रष्टि हो, तो थोड़ा पत्नी सुख प्राप्त होता है, लेकिन फिर भी पत्नी के कारण कलह बनी रहेगी तथा वह दाम्पत्य जीवन का पूर्ण आनंद न उठा सकेगा ।
  • सप्तम भाव में शनि हो तो व्यक्ति कठोर ह्रदय और राजनीति में अच्छा होता है, लेकिन यह सुख थोड़ा ही कहा जा सकता है ।
  • सप्तम भाव में शनि हो, तो व्यक्ति के लिए यात्रा करना भी कष्टदायक हो सकता है|
  •  व्यक्ति को न्यायालय एवं राज्य से निराशा प्राप्त होती है
  • प्रबल शनि सप्तम भाव में पत्नी से संपत्ति प्रदान करता है, स्थाई वैभव भी संभव है ।
  • ऐसा शनि स्त्री की कुंडली में होतो उसका विवहा विधुर , आयु में बड़े एवं संपत्तिवान व्यक्ति से होता है ।
  • मिथुन , कन्या , धनु , मीन राशि का शनि सप्तम भाव में ज्योतिष , अध्यापन , सम्पादन , गणित, मुद्रण के क्षेत्र में सहायक होता है ।
  • बाल्यावस्था में माता अथवा पिता का देहांत होता है , व्यक्तिगोद भी लिया जा सकता है
  • 52 से 55वें वर्ष में धर्मपत्नी से विछोह संभव है ।

सप्तम भाव में शनि के लिए उपाय

 

  • पराई स्त्री से अवैध संबंध कभी न बनाएं ।
  •  हर शनिवार के दिन काली गाय को घी से चुपड़ी हुई रोटी खिलाएं ।
  • शनि यंत्र धारण करें ।
  • मिट्टी के पात्र में शहद भरकर खेत में मिट्टी के नीचे दबाएं। खेत की जगह बगीचे में भी दबा सकते हैं ।
  • अपने हाथ में घोड़े की नाल का शनि छल्ला धारण करें ।
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13 Oct, 2018 Blog

ShaniDev Ke Kop Se Bachayenge Ye Upay / शनिदेव के कोप से बचाएंगे ये उपाय

https://youtu.be/a4Gz4AaqYpQ

शनिदेव के कोप से बचाएंगे ये उपाय

शनिदेव को न्याय का देवता कहा जाता है। शनिदेव अच्छे कर्मों का अच्छा फल देते हैं, और बुरे कर्मों का बुरा फल। लेकिन कुछ लोगों की सोच बन जाती है कि शनिदेव सिर्फ बुरा ही करते हैं। लेकिन शनिदेव सिर्फ बुरा नहीं करते बल्कि वो बुरे लोगों के साथ बुरे और अच्छे लोगों के साथ अच्छे हैं। शनि की टेढ़ी नजर ग्रहों के अनुसार अलग-अलग दुष्परिणाम देती है।

  • सूर्य पर दृष्टि हो तो व्यक्ति का दांपत्य जीवन खराब होता है।
  • इससे पिता पुत्र में सम्बन्ध अच्छे नहीं होते हैं।
  • अगर चन्द्रमा पर हो तो तीव्र वैराग्य पैदा होता है।
  • इससे व्यक्ति सन्यासी या मानसिक रोगी होता है।
  • अगर शनि की नजर मंगल पर हो तो विस्फोट जैसी स्थिति आती है।
  • इसके प्रभाव से प्रचंड दुर्घटना के योग बनते हैं।
  • बुध पर दृष्टि हो तो व्यक्ति धूर्त, चालाक होता है।
  • लेकिन इससे त्वचा की समस्या हो जाती है।
  • बृहस्पति पर दृष्टि हो तो व्यक्ति पेट का रोगी होता है।
  • इससे ज्ञानी और अहंकारी भी होता है।
  • शुक्र पर दृष्टि हो तो चरित्र दोष हो जाता है।
  • राहु या केतु पर दृष्टि हो तो व्यक्ति नशे का शिकार होता है। 
  • लेकिन कभी कभी राजनीति में सफलता पा जाता है।

 

ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही ग्रहों पर शनि की दृष्टि भी लाभकारी होती है।
  • जब शनि अपनी राशि या उच्च राशि को देखता हो।
  • जब शनि मेष, कर्क या सिंह राशि में हो।
  • जब शनि पर बृहस्पति की दृष्टि हो।
  • जब शनि कुम्भ राशि में हो।
  • जब शनि की दृष्टि लाभकारी हो तो व्यक्ति को धन बनाता है।
  • साथ ही व्यक्ति घर से दूर जाकर सफल होता है।

ज्योतिष के जानकारों का ये मानना है कि शनि की कृपा पाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

जैसे जब व्यक्ति सत्य बोलता है और अनुशासित रहता है। कमजोर और निर्बल लोगों की खूब सेवा करता है।जब व्यक्ति अपने बड़े बुजुर्गों की सेवा करता है।फलदार और लम्बी अवधि तक रहने वाले पेड़ लगाता है।जब व्यक्ति भगवान शिव की या कृष्ण की नियम पूर्वक उपासना करता है। तो शनि देव उस पर जरुर अपनी कृपा बरसाते हैं। अगर शनि नाराज हो जाएं तो जीवन में परेशानियों का अंबार लग जाता है। कुछ उपायों के द्वारा शनि देव को प्रसन्न किया जा सकता है।

ज्योतिष में कुछ सरल उपाय हैं जिन्हें अपनाकर आप शनि की टेढ़ी नजर से बच सकते हैं।
  • कभी भी शनि के किसी ऐसी मूर्ति के दर्शन ना करें जिसमें शनि की आंखें हो।
  • हर शनिवार के दिन लाल वस्त्र धारण करके हनुमान जी के सामने खड़े हों।
  • हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • रोज शाम पश्चिम दिशा की ओर दीपक जलाकर शनि देव के मंत्र का जाप करें।
  • घर के छोटों और सहायकों के साथ अच्छा व्यवहार रखें।
  • नीले रंग का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
इसके साथ ही आप कुछ और उपायों से शनि को प्रसन्न कर सकते हैं।
  • जीवन में ईमानदार बनें, सत्य बोलें और बड़े बुजुर्गों को सम्मान दें।
  • तुलसी के पौधे में और पीपल में जल डालें।
  • शनिवार सायंकाल सरसों के तेल का दीपक चौराहे या पीपल के नीचे जलाएं।
  • कभी भी हरे पेड़ ना काटें, गर्भपात ना करवाएं।
  • सूर्योदय के पूर्व अवश्य जागें और शिव जी की उपासना करें।
  • शनि देव के मूल मंत्र 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' का जाप करें।
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13 Oct, 2018 Blog

Chunav Me Chahte Hai Jeet to Is Waqt Bhare Parcha / चुनाव में चाहते हैं जीत, तो इस वक्त भरें पर्चा

https://youtu.be/ZIgqc4KblGo

चुनाव में चाहते हैं जीत, तो इस वक्त भरें पर्चा

यदि आप या आपका कोई  परिचित लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा, जिला पंचायत, जनपद पंचायत, नगर पालिक निगम, ग्राम पंचायत, सोसायटी या अन्य किसी पद के लिए चुनाव लड़ने का सोच रहे हैं, तो यहां वास्तु एवं ज्योतिषानुसार कुछ ऐसी बातें बताई जा रही हैं जिसके बारे में आप शायद ही जानते होंगे। वास्तु और ज्योतिष के ये छोटे-छोटे टिप्स आप आजमाएंगे तो आपको चुनाव जीतने में किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा और आप अपने प्रतिद्वंद्वी को आसानी से हरा सकते हैं। अत: जानिए कुछ विशेष एवं महत्वपूर्ण उपाय|

राहुकाल में भूलकर भी चुनावी सभा न करें :

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार राहुकाल में सभी प्रकार के शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इस काल में चुनावी सभा नहीं करें। राहुकाल में की गई चुनावी आमसभा विफल होती है। मतदाता के मन में भ्रांतियां फैलेंगी और प्रत्याशी एवं पार्टी के प्रति नकारात्मक विचार बढ़ेंगे, आमसभा में भी बाधाएं आएंगी, विवादों की स्थितियां बनेंगी। राहुकाल में चुनावी फॉर्म भी नहीं भरना चाहिए। इस काल में फॉर्म भरने से प्रतिद्वंद्वी आप पर भारी पड़ेगा एवं पराजय का सामना करना पड़ता है। राहुकाल का समय प्रतिदिन अलग-अलग होता है।

वार अनुसार राहुकाल का समय इस प्रकार है:-

सोमवार : प्रात: 7.30 बजे से 9.00 बजे तक।

मंगलवार : दोपहर 3.00 बजे से 4.30 बजे तक।

बुधवार : दोपहर 12.00 बजे से 1.30 बजे तक।

गुरुवार : दोपहर 1.30 बजे से 3.00 बजे तक।

शुक्रवार : प्रात: 10.30 बजे से 12.00 बजे तक।

शनिवार : प्रात: 9.30 बजे से 10.30 बजे तक।

रविवार : दोपहर 4.30 बजे से 6.00 बजे तक।

 

अब जानिए वो नक्षत्र जिसमें फॉर्म भरकर आप जीत को सुनिश्चित कर सकते हैं| इन नक्षत्रों में चुनाव का फॉर्म भरना प्रतिद्वंद्वी को स्तंभित करने वाला, मतदाता को आकर्षित करने वाला होकर पद प्राप्ति में सहायक होकर विजय दिलाता है। अत: प्रत्याशी को अपना चुनावी फॉर्म इन नक्षत्रों में ही भरना चाहिए-

* रोहिणी * मृगशीर्ष * पुनर्वसु * पुष्य * हस्त * स्वाति * धनिष्‍ठा * शतभिषा * रेवती

विजय के लिए शुभ पशु-पक्षी :

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इन पशु या पक्षियों को मुख्य निवास स्थान अथवा प्रमुख चुनाव कार्यालय में रखने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| जिससे चुनाव परिणाम पक्ष में होता है-

 सफेद घोड़ा, मुर्गा, सफेद बैल, कबूतर, लाल गाय, सफेद गाय, हिरण, मच्छर, पतंगा, नेवला, गोकुल गाय, हाथी, मछली, चिड़िया, मोर, मधुमक्खी, काली चींटी, चकोर और भौंरा।

अब जानिए कौन से पशु पक्षी अशुभ फल देते हैं| जिन्हें मुख्य निवास स्थान अथवा प्रमुख चुनाव कार्यालय में रखने से नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है|

भैंस, बंदर, बछड़ा, बिल्ली, उल्लू, खजूरा, लाल चींटी, लाल कुत्ता, सांप, दीमक, बाघ, कौवा, बिच्छू, बकरा, सिंह, गिद्ध, कान, तोता एवं लाल बैल।

विजय प्राप्ति के लिए पेड़-पौधे : प्रत्याशी के घर एवं चुनाव के मुख्‍य कार्यालय में विद्यमान पेड़-पौधे भी विजय एवं पराजय के सूचक होते हैं|

विजय सूचक पेड़-पौधे :

रूईदार, तुलसी, मनीप्लांट, पारिजात और औदुम्बर।

पराजयसूचक पेड़-पौधे : अंगूर, कांटेदार वृक्ष, बबूल, बेर, अनार, पपीता, पलास, इमली, पीपल, बरगद, केतकी।

ध्वजा वेध :

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ध्वजा या झंडे का एक विशिष्ट महत्व होता है। वर्तमान में एक पक्ष का प्रतीक ध्वजा का लहराना चुनाव में विजयकारक होता है। प्रत्याशी के निवास स्थान एवं चुनाव के मुख्‍य कार्यालय में लगाई गई ध्वजा का स्थान सुनिश्चित होता है। इस ध्वजा को वेध कर दिया जाए या ध्वजा विपरीत दिशा में लगा दी जाए तो उससे ध्वजा वेध होकर प्रतिद्वंद्वी की ध्वजा फहरा जाती है एवं प्रत्याशी को पराजय का सामना करना होता है। ध्वजा के सामने किसी भी प्रकार का पेड़, खंभा नहीं होना चाहिए। ध्वजा लहराते समय किसी वस्तु आदि से बाधित होकर अटकना नहीं चाहिए। 

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13 Oct, 2018 Blog

Navratri Aur Dushera Subh mahurat Aur Poojan Vidhi / नवरात्रि और दशहरा शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

https://youtu.be/fUWvJIxhL6Y

नवरात्रि और दशहरा- शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

हर साल की तरह नवरात्रि का त्यौहार बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाएगा। लेकिन इस बार शारदीय नवरात्र का विशेष मुहूर्त और विजयादशमी का मुहूर्त का ध्यान रखना आवश्यक है। इस वर्ष आश्विन शुक्ल पक्ष में नवरात्रि दिनों में द्वितीया तिथि क्षय होकर पंचमी की वृद्धि हुई है। ह्रास वृद्धि होने के अनुसार नवरात्र पूरे ही मानी जाएगी। प्रतिपदा तिथि 2 घटी 28 पल तक रहेगी देश के पूर्व भाग में इसका मान आगे पीछे होगा। देवी पुराण तथा डामर तंत्र के अनुसार मुहूर्त मात्र प्रतिपदा की प्राप्ति हो तब तो नवरात्र उसी में आरंभ करना चाहिए। जैसे कि शास्त्र में वर्णन है।

शास्त्रीय आदेशानुसार तारीख 10 अक्टूबर बुधवार में वृश्चिक लग्न एवं लाभ तथा अमृत की चौघड़िया में नवरात्र घट स्थापना करना श्रेष्ठ रहेगा। चित्रा नक्षत्र वैधृति योग का व्यवधान नहीं है। क्योंकि इनके आद्यपाद का परित्याग करना होता है|

यदि आश्विन मास प्रतिपदा तिथि में वैधृति के साथ चित्रा का योग हो तो आद्यपाद  को परित्याग करके नवरात्रि प्रारंभ कर देना चाहिए । इस वर्ष कोई व्यवधान नहीं होगा ।ध्यान रहे बुधवार में प्रथम और द्वितीया नवरात्रि के संबंधित माता शैलपुत्री एवं ब्रह्मचारिणी की पूजा आराधना संपन्न की जाएगी।
विजयादशमी का भी कुछ विवादास्पद है। क्योंकि इस वर्ष  विजयादशमी में थोड़ा सा धर्म शंका का समाधान आवश्यक है। वैसे तो विजयादशमी अपराह्नकाल व्यापिनी आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी के दिन मनाई जाती है। स्कंद पुराण मतानुसार इसी दिन अपराजिता देवी देवी पूजन होता है। 

निर्णय सिंधु में वर्णन है अपराह्न काल दिन के चतुर्थ भाग को कहते हैं। इस आधार पर इस वर्ष 18 अक्टूबर को गुरुवार के दिन 13:14 से शुरू होकर 15:29 तक समाप्त होगा और उसी समय आश्विन शुक्ल पक्ष नवमी समाप्त होगी। अर्थात अपराह्न काल  को दशमी स्पर्ष नहीं करेगी। ऐसी परिस्थिति में दिन गुरुवार को विजयादशमी मनाना उचित नहीं है। अग्रिम दिन 19 अक्टूबर शुक्रवार को दशमी प्रदोष काल तक यानी कि 17:57 विद्यमान है। इस आधार पर अपराह्न काल तथा विजय मुहूर्त दोनों को स्पर्ष  करेगी। इसलिए विजयदशमी 19 अक्टूबर को शास्त्र के अनुसार योग बन रहा है।  कुछ विद्वान का तर्क है कि विजयादशमी में श्रवण नक्षत्र की व्याप्ति होनी चाहिए। इस वर्ष अक्टूबर 18 को नवमी के दिन गुरुवार दिन में मिलती है।
 इसी सूत्र के अनुसार पश्चिम भारत के कुछ विद्वान विजयादशमी 18 अक्टूबर को मनाने पर अपना निर्णय लिए हैं।
 ध्यान रहे वार, तिथि, माह, संवत्सर तदनुसार कलकल्पांतर युग युगांतर की गणना के आधार सूर्य चंद्रमा पर है। नक्षत्र का विभाजन केवल चंद्रमा करता है। इसलिए पर्व उत्सव का निर्णय में तिथि का महत्व माना गया है। निर्णय सिंधु में लिखा है कि तिथि को काल का शरीर कहा गया है और कर्मकाल व्यापिनी तिथि अनिवार्य है। नक्षत्र के बिना काम चल सकता है परंतु तिथि बिना काम नहीं  चल सकता। इसीलिए 19 अक्टूबर को ही विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाना चाहिए।

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13 Oct, 2018 Blog

Mahakali Swaroop Ki Katha / महाकाली स्वरूप की कथा

https://youtu.be/HYa2CPcHngg

महाकाली स्वरूप की कथा

देवी श्मशान भूमि वासी हैं।मुखतः देवी अपने दो स्वरूपों में विख्यात हैं, 'दक्षिणा काली' जो चार भुजाओं से युक्त हैं तथा 'महा-काली' के रूप में देवी की २० भुजाएं हैं।

दुर्गा सप्तशती के अनुसार एक समय समस्त त्रि-भुवन (स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी) शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दैत्य भाइयों के अत्याचार से ग्रस्त थे। दोनों समस्त देवताओं के अधिकारों को छीनकर उसका स्वयं ही भोग करते थे, देवता स्वर्ग विहीन इधर-उधर भटकने वाले हो गए थे। समस्या के समाधान हेतु, सभी देवता एकत्र हो हिमालय में गए और देवी आद्या-शक्ति, की स्तुति, वंदना करने लगे। परिणामस्वरूप, 'कौशिकी' नाम की एक दिव्य नारी शक्ति जो कि भगवान शिव की पत्नी 'गौरी या पार्वती' में समाई हुई थी, लुप्त थी, समस्त देवताओं के सनमुख प्रकट हुई। शिव अर्धाग्ङिनी के देह से विभक्त हो, उदित होने वाली वह शक्ति घोर काले वर्ण की थी तथा काली नाम से विख्यात हुई।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा ने शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो महा राक्षसों को युद्ध में परास्त किया तथा तीनों लोकों को उन दोनों भाइयों के अत्याचार से मुक्त किया। चण्ड और मुंड नामक दैत्यों ने जब देवी दुर्गा से युद्ध करने का आवाहन किया, देवी उन दोनों से युद्ध करने हेतु उद्धत हुई। आक्रमण करते हुए देवी, क्रोध के वशीभूत हो अत्यंत उग्र तथा भयंकर डरावनी हो गई, उस समय उनकी सहायता हेतु उन्हीं के मस्तक से एक काले वर्ण वाली शक्ति का प्राकट्य हुआ, जो देखने में अत्यंत ही भयानक, घनघोर तथा डरावनी थी। वह काले वर्ण वाली देवी, 'महा-काली' ही थी, जिन का प्राकट्य देवी दुर्गा की युद्ध भूमि में सहायता हेतु हुई थी।

चण्ड और मुंड के संग हजारों संख्या में वीर दैत्य, देवी दुर्गा तथा उनके सहचरियों से युद्ध कर रहे थे, उन महा-वीर दैत्यों में 'रक्तबीज' नाम के एक राक्षस ने भी भाग लिया था। युद्ध भूमि पर देवी ने रक्तबीज दैत्य पर अपने समस्त अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण किया, जिससे कारण उस दैत्य रक्तबीज के शरीर से रक्त का स्राव होने लगा। परन्तु, दैत्य के रक्त की टपकते हुए प्रत्येक बूंद से, युद्ध स्थल में उसी के सामान पराक्रमी तथा वीर दैत्य उत्पन्न होने लगे तथा वह और भी अधिक पराक्रमी तथा शक्तिशाली होने लगा। देवी दुर्गा की सहायतार्थ, देवी काली ने दैत्य रक्तबीज के प्रत्येक टपकते हुए रक्त बूंद को, जिह्वा लम्बी कर अपने मुंह पर लेना शुरू किया। परिणामस्वरूप, युद्ध क्षेत्र में दैत्य रक्तबीज शक्तिहीन होने लगा, अब उसके सहायता हेतु और किसी दैत्य का प्राकट्य नहीं हो रहा था, अंततः रक्तबीज सहित चण्ड और मुंड का वध कर देवी काली तथा दुर्गा ने तीनों लोकों को भय मुक्त किया। देवी, क्रोध-वश महा-विनाश करने लगी, इनके क्रोध को शांत करने हेतु, भगवान शिव युद्ध भूमि में लेट गए। देवी नग्नावस्था में थीं तथा इस अवस्था में नृत्य करते हुए, जब देवी का पैर शिव जी के ऊपर आ गया, उन्हें लगा की वे अपने पति के ऊपर खड़ी हैं उसके बाद ही लज्जा वश देवी का क्रोध शांत हुआ तथा जिह्वा बहार निकल पड़ी।

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