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19 Apr, 2018 Blog

Astromitram : Jaanen Shri Yantra ki Shakti / जानें श्री यंत्र की शक्ति

जानें श्री यंत्र की शक्ति

श्रीयंत्र की अद्भुत शक्ति को समझने के बाद उसके स्वरूप को भी विस्तार से जानलेना जरूरी है... क्योंकि श्री यंत्र की स्थापना करते समय ये निश्चित करने लेना भी जरूरी है कि सही श्रीयंत्र ही स्थापित किया गया है... 


श्रीयंत्र अपने आप में रहस्यपूर्ण है। यह सात त्रिकोणों से निर्मित है। मध्य बिन्दु-त्रिकोण के चतुर्दिक् अष्ट कोण हैं। उसके बाद दस कोण तथा सबसे ऊपर चतुर्दश कोण से यह श्रीयंत्र निर्मित होता है। यंत्र ज्ञान में इसके बारे में स्पष्ट किया गया है-


चतुर्भिः शिवचक्रे शक्ति चक्रे पंचाभिः।
नवचक्रे संसिद्धं श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः॥


श्रीयंत्र के चतुर्दिक् तीन परिधियां खींची जाती हैं। ये अपने आप में तीन शक्तियों की प्रतीक हैं। इसके नीचे षोडश पद्मदल होते हैं तथा इन षोडश पद्मदल के भीतर अष्टदल का निर्माण होता है, जो कि अष्ट लक्ष्मी का परिचायक है। अष्टदल के भीतर चतुर्दश त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो चतुर्दश शक्तियों के परिचायक हैं तथा इसके भीतर दस त्रिकोण स्पष्ट देखे जा सकते हैं, जो दस सम्पदा के प्रतीक हैं। दस त्रिकोण के भीतर अष्ट त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो अष्ट देवियों के सूचक कहे गए हैं। इसके भीतर त्रिकोण होता है, जो लक्ष्मी का त्रिकोण माना जाता है। इस लक्ष्मी के त्रिकोण के भीतर एक बिन्दु निर्मित होता है, जो भगवती का सूचक है। साधक को इस बिन्दु पर स्वर्ण सिंहासन पर विराजित भगवती लक्ष्मी की कल्पना करनी चाहिए।

इस प्रकार से श्रीयंत्र 2816 शक्तियों अथवा देवियों का सूचक है और श्री यंत्र की पूजा इन सारी शक्तियों की समग्र पूजा है।

श्री यंत्र का रूप ज्योमितीय होता है। इसकी संरचना में बिंदु, त्रिकोण या त्रिभुज, वृत्त, अष्टकमल का प्रयोग होता है। तंत्र के अनुसार श्री यंत्र का निर्माण दो प्रकार से किया जाता है- एक अंदर के बिंदु से शुरू कर बाहर की ओर जो सृष्टि-क्रिया निर्माण कहलाता है और दूसरा बाहर के वृत्त से शुरू कर अंदर की ओर जो संहार-क्रिया निर्माण कहलाता है।

चमत्कारी साधनाओं में श्रीयंत्र का स्थान सर्वोपरि है तथा मंत्र और तंत्र इसके साधक तत्व माने गए हैं। श्रीयंत्र सब सिद्धियों का द्वार है तथा लक्ष्मी का आवास है जिसमें अपने-अपने स्थान, दिशा, मंडल, कोण आदि के अधिपति व्यवस्थित रूप से आवाहित होकर विराजमान रहते हैं। मध्य में उच्च सिंहासन पर प्रधान देवता प्राण प्रतिष्ठित होकर पूजा प्राप्त करते हैं। श्रीयंत्र के दर्शन मात्र से साधक मनोरथ को पा लेता है।

शास्त्रकारों ने इस बात पर बल दिया है कि जिस प्रकार शरीर और आत्मा में कोई भेद नहीं होता है उसी प्रकार श्रीयंत्र और लक्ष्मी में कोई भेद नहीं होता है। भारतीय तंत्र विधा का आधार अध्यात्म है। इस विधा की प्राचीनता ऋग्वेद से पहचानी जा सकती है। वैदिक जीवन चर्या में पूजन, यज्ञ तथा तंत्र में साधना का अपना विशेष स्थान था। पूजन पद्धतियों का उपयोग जीवन को शांत, उन्नातिशील, ऐश्वर्यवान बनाने के लिए होता था। 

भौतिक जीवन में खुशहाली लाने के निमित्त श्रीयंत्र का निर्माण हुआ। श्रीयंत्र दरिद्रता रूपी स्थितियों को समाप्त करता है। ऋण भार से दबे साधकों के लिए यह रामबाण है। 
पूर्व जन्म के दुष्कर्मानुसार ही व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम योग, काक योग, दरिद्र योग, शकट योग, ऋण योग, दुयोग एवं ऋणग्रस्त योग आदि अशुभ योग मनुष्य को ऐश्वर्यहीन बनाते हैं। इन कुयोगों को दूर कर व्यक्ति को धन-ऐश्वर्य देने वाले यंत्रराज श्रीयंत्र की बड़ी महत्ता है। जिस प्रकार यंत्र एवं देवता में कोई भेद नहीं होता है। यंत्र देवता का निवास स्थान माना गया है। यंत्र और मंत्र मिलकर शीघ्र फलदायी होते हैं। श्रीयंत्र में लक्ष्मी का निवास रहता है। यह धन की अधिष्ठात्री देवी त्रिपुर-सुंदरी का यंत्र है। इसे षोडशी यंत्र भी कहा जाता है। 
श्रीयंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशार-युग्म, चतुर्दशार, अष्ट दल, षोडसार, तीन वृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें 4 ऊपर मुख वाले शिव त्रिकोण, 5 नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, 2 दशार, 5 शक्ति तथा बिंदु, अष्ट कमल, षोडश दल कमल तथा चतुरस्त्र हैं। ये आपस में एक-दूसरे से मिले हुए हैं। यह यंत्र मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष देने वाला है। 
श्री यंत्र में 9 त्रिकोण या त्रिभुज होते हैं जो निराकार शिव की 9 मूल प्रकृतियों के द्योतक हैं। मुख्यतः दो प्रकार के श्रीयंत्र बनाए जाते हैं दृ सृष्टि क्रम और संहार क्रम। सृष्टि क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 5 ऊध्वर्मुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शिव त्रिकोण कहते हैं। ये 5 ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं। 4 अधोमुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शक्ति त्रिकोण कहा जाता है। ये प्राण, मज्जा, शुक्र व जीवन के द्योतक हैं। संहार क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 4 ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव त्रिकोण होते हैं और 4 अधोमुखी त्रिकोण शक्ति त्रिकोण होते हैं।
श्री यंत्र में 4 त्रिभुजों का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि उनसे मिलकर 43 छोटे त्रिभुज बन जाते हैं जो 43 देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मध्य के सबसे छोटे त्रिभुज के बीच एक बिंदु होता है जो समाधि का सूचक है अर्थात यह शिव व शक्ति का संयुक्त रूप है। इसके चारों ओर जो 43 त्रिकोण बनते हैं वे योग मार्ग के अनुसार यम 10, नियम 10, आसन 8, प्रत्याहार 5, धारणा 5, प्राणायाम 3, ध्यान 2 के स्वरूप हैं।
श्रीयंत्र में प्रत्येक त्रिकोण एवं कमल दल का महत्व है... इन त्रिभुजों के बाहर की तरफ 8 कमल दल का समूह होता है जिसके चारों ओर 16 दल वाला कमल समूह होता है। इन सबके बाहर भूपुर है। मनुष्य शरीर की भांति ही श्री यंत्र की संरचना में भी 9 चक्र होते हैं जिनका क्रम अंदर से बाहर की ओर इस प्रकार है- केंद्रस्थ बिंदु फिर त्रिकोण जो सर्वसिद्धिप्रद कहलाता है। फिर 8 त्रिकोण सर्वरक्षाकारी हैं। उसके बाहर के 10 त्रिकोण सर्व रोगनाशक हैं। फिर 10 त्रिकोण सर्वार्थ सिद्धि के प्रतीक हैं। उसके बाहर 14 त्रिकोण सौभाग्यदायक हैं। फिर 8 कमलदल का समूह दुःख, क्षोभ आदि के निवारण का प्रतीक है। उसके बाहर 16 कमलदल का समूह इच्छापूर्ति कारक है। अंत में सबसे बाहर वाला भाग त्रैलोक्य मोहन के नाम से जाना जाता है। इन 9 चक्रों की अधिष्ठात्री 9 देवियों के नाम इस प्रकार हैं दृ 1. त्रिपुरा 2. त्रिपुरेशी 3. त्रिपुरसुंदरी 4. त्रिपुरवासिनी, 5. त्रिपुरात्रि, 6. त्रिपुरामालिनी, 7. त्रिपुरसिद्धा, 8. त्रिपुरांबा और 9. महात्रिपुरसुंदरी।
श्रीयंत्र कई प्रकार से निर्मित तथा कई रूपों में उपलब्ध होता है। विभिन्न प्रकार से अंकित श्रीयंत्रों का प्रभाव भी अलग-अलग तरह का होता है। सबसे विशेष बात यह है कि ताम्र पत्र पर अंकित और पारद निर्मित प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र ही सबसे अधिक प्रभावकारी होते हैं।

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19 Apr, 2018 Blog

Astromitram : Adbhut Siddhiprad Shri Yantra / अद्भुत सिद्धिप्रद श्री यंत्र

हर कार्य में सिद्धी देने वाला श्रीयंत्र एक अद्भुत यंत्र है.. शास्त्रों में कहा गया है कि श्रीयंत्र के दर्शन मात्र से ही लाभ मिलना शुरू हो जाता है...
श्रीयंत्र का उल्लेख तंत्रराज, ललिता सहस्रनाम, कामकला विलास, त्रिपुरोपनिषद आदि विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। महापुराणों में श्री यंत्र को देवी महालक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है। महालक्ष्मी स्वयं कहती हैं दृ ‘ श्री यंत्र मेरा प्राण, मेरी शक्ति, मेरी आत्मा तथा मेरा स्वरूप है। श्री यंत्र के प्रभाव से ही मैं पृथ्वी लोक पर वास करती हूं। ’

श्रीयंत्र को यंत्रराज, यंत्र शिरोमणि, षोडशी यंत्र व देवद्वार भी कहा गया है। ऋषि दत्तात्रेय और दुर्वासा ने श्रीयंत्र को मोक्षदाता माना है। जैन शास्त्रों ने भी इस यंत्र की प्रशंसा की है। जिस तरह शरीर व आत्मा एक दूसरे के पूरक हैं उसी तरह देवता व उनके यंत्र भी एक दूसरे के पूरक हैं। यंत्र को देवता का शरीर और मंत्र को आत्मा कहते हैं। यंत्र और मंत्र दोनों की साधना उपासना मिलकर शीघ्र फल देती है। जिस तरह मंत्र की शक्ति उसके शब्दों में निहित होती है उसी तरह यंत्र की शक्ति उसकी रेखाओं और बिंदुओं में होती है। मकान, दुकान आदि का निर्माण करते समय यदि उसकी नींव में प्राण प्रतिष्ठित श्री यंत्र को स्थापित करें तो वहां के निवासियों को श्री यंत्र की अदभुत और  चमत्कारी शक्तियों का लाभ मिल सकता है... 

यह यंत्र मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाला है। इसकी कृपा से मनुष्य को अष्ट सिद्धि व नौ निधियों की प्राप्ति हो सकती है। श्री यंत्र के पूजन से सभी रोग दूर होते हैं और शरीर की कांति निर्मल होती है। इसकी पूजा से शक्ति स्तंभन होता है व पंचतत्वों पर विजय प्राप्त होती है।
श्रीयंत्र की कृपा से मनुष्य को धन, समृद्धि, यश, कीर्ति, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। श्री यंत्र के पूजन से रुके हुए कार्य बनते हैं। श्री यंत्र की श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से पूजा करने से दुःख दारिर्द्य का नाश होता है। शारीरिक और मानसिक शक्ति पुष्ट होती है। इस यंत्र की पूजा से दस महाविद्याओं की कृपा भी प्राप्त होती है। श्री यंत्र की साधना से आर्थिक उन्नति होती है और व्यापार में सफलता मिलती है।

इस अद्भुत यंत्र को खास बनाता है मां लक्ष्मी का साथ... एक सुन्दर आख्यान है कि एक बार लक्ष्मी अप्रसन्न होकर बैकुण्ठ को चली गईं, इससे पृथ्वी तल पर काफी समस्याएं पैदा हो गईं। ब्राह्मण और वणिक वर्ग बिना लक्ष्मी के दीन-हीन, असहाय से घूमने लगे, तब ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, वशिष्ठ ने निश्चय किया, कि मैं लक्ष्मी को प्रसन्न कर भूतल पर ले आऊंगा।
वशिष्ठ विष्णु की आराधना करने लगे। जब विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए, तो वशिष्ठ ने कहा, कि हम पृथ्वी पर बिना लक्ष्मी के दुःखी हैं, हमारे आश्रम उजड़ गए हैं, चौपट हो गए हैं और जीवन की उमंग और उत्साह समाप्त हो गया है।

भगवान विष्णु, वशिष्ठ को साथ लेकर लक्ष्मीजी के पास गए और उन्हें मनाने लगे, परन्तु लक्ष्मी नहीं मानीं और उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा, कि मैं किसी भी स्थिति में भूतल पर जाने को तैयार नहीं हूं। क्योंकि पृथ्वी पर साधना और शुद्धि नहीं है।
हताश होकर वशिष्ठ पुनः धरती पर लौट आए और लक्ष्मी के निर्णय से सबको अवगत करा दिया। तब देवताओं के गुरु बृहस्पति ने कहा, कि अब एकमात्र ‘ श्रीयंत्र साधना ’ ही बची है, और यदि सिद्ध ‘ श्री यंत्र ’ बना कर स्थापित किया जाए, तो निश्चय ही लक्ष्मीजी को आना पड़ेगा।

बृहस्पति की बात से ॠषियों में हर्ष की लहर दौड़ गई और उन्होंने बृहस्पति के निर्देशानुसार धातु पर श्रीयंत्र का निर्माण किया और उसे मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त किया और दीपावली से दो दिन पूर्व धन त्रयोदशी को उस श्रीयंत्र को स्थापित कर विधि-विधान से उसका पूजन किया। पूजन समाप्त होते-होते लक्ष्मी स्वयं वहां उपस्थित हो गईं और बोलीं दृ मैं किसी भी स्थिति में यहां आने के लिए तैयार नहीं थी, यह मेरा प्रण था, परन्तु बृहस्पति की युक्ति से मुझे आना ही पड़ा। श्रीयंत्र मेरा आधार है और इसी में मेरी आत्मा निहित है।
इस कथा से यह भली भांति स्पष्ट है, कि श्रीयंत्र अपने आप में लक्ष्मी का सर्वाधिक प्रिय स्थान है, और जहां यह यंत्र स्थापित होता है, वहां लक्ष्मी स्थायी रूप से रहती ही हैं।

साधकों, ॠषियों, मुनियों और तपस्वियों ने एक स्वर से यह स्वीकार किया है, कि यह यंत्र अद्भुत धनप्रदायक यंत्र है। अन्य किसी भी प्रयोग या साधना से लक्ष्मी प्रसन्न हों या न हों, परन्तु श्रीयंत्र का स्थापन करने से निश्चय ही लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वह साधक को पूर्ण भौतिक सुख, सफलता और सम्पन्नता प्रदान करती हैं।

श्री यंत्र यदि मंत्र सिद्ध है, तो इस पर अन्य किसी भी प्रकार का प्रयोग या उपाय करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह स्वयं ही चौतन्य हो जाता है और जहां पर भी यह स्थापित होता है, उसको अनुकूल फल और प्रभाव देने लग जाता है। जिस प्रकार अगरबत्ती किसी व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं होती, वह जहां पर भी जलाई जाती है, वहीं पर सुगन्ध बिखेरने लग जाती है, इसी प्रकार मंत्र सिद्ध चौतन्य श्रीयंत्र जहां पर भी स्थापित होता है वहीं पर यह अनुकूल फल देने में समर्थ हो जाता है।

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17 Apr, 2018 Blog

Astromitram : अक्षय तृतीया का पूजन व प्रयोग / Akshya Tratiya Ka Pujan Evam Prayog

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री बताते हैं की अक्षय तृतीया के दिन ऐसी साधना करने से सभी सुख प्राप्त होते हैं. लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए अक्षय तृतीया पर किया गया यह उपाय किसी चमत्कार से कम नहीं है. स्फटिक के श्रीयंत्र को पंचोपचार-पूजन से विधिवत स्थापित करें. माता लक्ष्मी का ध्यान करें, श्रीसूक्त का पाठ करें. जितना संभव हो सके, कमलगट्टे की माला से नियमित इस मंत्र का जाप करते हुए एक गुलाब अर्पित करते रहें:---
 
‘‘महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नयै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात‘‘
यूं पूजा करके ऐसे श्रीयंत्र को आप इस दिन व्यावसायिक स्थल पर भी स्थापित कर सकते हैं. लक्ष्मी की अपार कृपा हो जायेगी.

विशेष बातें जो ध्यान रखनी हैं--
 

  1. जिन जातकों के कार्यो में अड़चनें आ रही हैं, अथवा जिनके व्यापार में लगातार हानि हो रही है.
  2. अधिक परिश्रम के बावजूद धन नहीं टिकता है और घर में अशांति बनी रहती है.
  3. संतान मनोकूल कार्य ना करें तथा विरोधी चहुंओर से परेशान कर रहे हों.
  4. जिन महिलाओं के वैवाहिक सुख में तनाव या अवसाद की स्थिति बनी रहती है.

ऐसे में अक्षय तृतीया का व्रत रख कर और गर्मी में निम्न वस्तुओं जैसे - छाता, दही, जूता-चप्पल, जल का घड़ा, सत्तू, खरबूजा, तरबूज, बेल का शरबत, मीठा जल, हाथवाले पंखे, टोपी, सुराही आदि का दान करने से उपरोक्त समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है.

 

  • आखा तीज पर ऋण से मुक्ति हेतु ‘कनकधारा यंत्र’ की लाल वस्त्र पर पूजा कर घर में स्थापना करें. पंचोपचार से पूजा करें. 51 दिनों तक श्रद्धा से यंत्र का पाठ करें. धीरे-धीरे ऋण कैसे उतर गया, यह पता भी नहीं चलेगा.
  • आकस्मिक धन प्राप्ति हेतु अक्षय तृतीया से प्रारंभ करते हुए माता लक्ष्मी के मंदिर में हर शुक्र वार धूपबत्ती व गुलाब की अगरबत्ती दान करने से जीवन में अचानक धन प्राप्ति के योग बनते हैं.
  • वास्तुदोष से यदि आर्थिक समृद्धि रु की हो, तो ढक्कन सहित एक चांदी की डिबिया में गंगाजल भर दें. डिब्बी पर मौली के साथ एक मूंगा बांध दें. अक्षय तृतीया को इसे ईशान-कोण में स्थापित कर दें. आर्थिक समृद्धि मिलने लगेगी. सभी प्रकार का नुकसान खत्म हो जायेगा.
  • धनधान्य में श्रीवृद्धि हेतु अक्षय तृतीया को एक मुट्ठी बासमती चावल श्री महालक्ष्मी का ध्यान व श्री मंत्र का जाप करते हुए बहते जल में प्रवाहित कर दें. आश्चर्यजनक लाभ होगा.
  • धन की विशेष प्राप्ति के लिए अक्षय तृतीया को स्वर्ण में जड़ित चौदहमुखी रु द्राक्ष का प्रथम पंचोपचार से पूजन करें. लाल फूल अर्पित करें. रु द्राक्ष की माला से ú हृीं नमः मम गृहे धनं कुरु  कुरु  स्वाहा  की एक माला का जाप करें. 42 दिन तक जप करें. तत्पश्चात रु द्राक्ष को गले में धारण कर लें.
  • अक्षय तृतीया को दान व उपवास करने से हजार गुना फल मिलता है. महालक्ष्मी की साधना विशेष लाभकारी व फलदायी सिद्ध होती है.
  • अक्षय तृतीया पर यह करें
  • अक्षय तृतीया के दिन विवाह, गृह प्रवेश, भूमि-पूजन, वाहन खरीदना, स्वर्णाभूषण क्र य, पदभार ग्रहण, नया सामान क्र य, नया व्यापार शुरू करने के साथ समस्त शुभ कार्यों को प्रारंभ किया जा सकता है.
  • इस दिन समुद्र या गंगा अथवा किसी अन्य नदी में स्नान करना चाहिए.
  • प्रातः पंखा, चावल, नमक, घी, शक्कर, साग, इमली, फल व वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए. फिर उसे दक्षिणा भी देकर विदा करना चाहिए.
  • इस दिन व्यक्ति को सत्तू अवश्य खाना चाहिए.
  • इस दिन नये वस्त्र, शस्त्र, आभूषणादि बनवाना या धारण करना चाहिए.
  • नये स्थान, संस्थान, समाज आदि की स्थापना या उद्घाटन भी इसी दिन करना चाहिए.
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17 Apr, 2018 Blog

Astromitram : अक्षय तृतीया पर शनि देव होंगे वक्री / Akshya Tratiya par Shani Dev Honge Vakri

शनि देव होंगे वक्री


अक्षय तृतीया के शुभ दिन पर सुबह 7 बजकर 17 मिनट पर शनि देव वक्री होंगें और शनि के वक्रगति होने से एवं शनि मंगल का शुक्र के साथ षडाष्‍टक योग से अपराधों में वृद्धि और दुर्घटनाओं में इजाफा होगा। इसके साथ ही महंगाई बढ़ने की भी संभावना है। शनि का यह वक्री काल 6 सितंबर तक रहेगा।

आइए जानते हैं शनि के वक्री होने का 12 राशियों पर क्‍या प्रभाव पड़ेगा -ः

मेष राशि: मेष राशि के लोगों को शनि देव की कृपा से न्‍याय के क्षेत्र में लाभ मिलेगा।

वृषभ राशि: शनि के प्रकोप के कारण वृषभ राशि के लोगों को कष्‍टों का सामना करना पड़ सकता है।

मिथुन राशि: मिथुन राशि के लोगों को व्‍यापार में लाभ होगा और इनके घर में सुख और समृद्धि का आगमन होगा।

कर्क राशि: शनि देव की कृपा से कर्क राशि के जातक अपने शत्रुओं को परास्‍त कर पाएंगें। अगर कोई मुकदमा चल रहा है तो उसमें भी आपको जीत मिलेगी।

सिंह राशि: सिंह राशि के लोगों को शनि के वक्री होने के कारण संतान से कष्‍ट मिल सकता है।

कन्‍या राशि: शनि के वक्री होने पर कन्‍या राशि के लोगों के परिवार में क्‍लेश का माहौल बना रहेगा।

तुला राशि: तुला राशि के जातकों के लिए इस दौरान स्‍थान परिवर्तन के योग बन रहे हैं।

वृश्चिक राशि: शनि के इस संचार में वृश्चिक राशि के लोगों को कोई नया समाचार मिल सकता है।

धनु राशि: आपको चोट लग सकती है। वाहन चलाते समय सावधानी बरतें।

मकर राशि: मकर राशि के लोगों को शनि के इस परिवर्तन के कारण धन की हानि उठानी पड़ सकती है।

कुंभ राशि: कुंभ राशि के लोगों को अक्षय तृतीया के दिन वक्री शनि धन लाभ देंगें। आपके लिए ये शुभ समय है।

मीन राशि: मीन राशि के लोगों को शनि के वक्री होने पर उच्‍च पद की प्राप्‍ति होगी

कैसे करें शनि देव को प्रसन्न-

शनि देव को प्रसन्‍न करने और उनके प्रकोप को शांत करने के लिए दशरथकृत शनि स्रोत का पाठ करें। मंगलवार या शनिवार के दिन हनुमान जी को चोला चढ़ाएं। शनिवार के दिन सरसों के तेल का दान करें।
 

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17 Apr, 2018 Blog

Astromitram : जानिए अक्षय तृतीया 2018 पूजन का शुभ मुहूर्त / Akshya Tratiya 2018 Shubh Muhurt

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ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री बताते हैं की शुभ कार्यों के लिए अन्य दिनों से अक्षय तृतीया का दिन इतना ज्घ्यादा शुभ होता है कि इस दिन आप बिना किसी ज्घ्योतिषीय सलाह या मुहूर्त के विवाह आदि कार्य संपन्घ्न कर सकते हैं। अगर आप विवाह करना चाहते हैं और आपको कोई शुभ मुहूर्त नहीं मिल पा रहा है तो आप अक्षय तृतीया के दिन बिना मुहूर्त के विवाह कर सकते हैं।
इस वर्ष अक्षय तिथि की शुरुआत 18 अप्रैल की सुबह 4.47 बजे होगी और समापन 19 अप्रैल की सुबह 3 बजकर 3 मिनट पर होगा।

अक्षय तृतीया 2018: पूजा मुहूर्त और सोना खरीदने का सही समय
वर्ष 2018 में अक्षय तृतीया 18जी अप्रैल  बुधवार के दिन मनाई जाएगी।
अक्षय तृतीय में लक्ष्मीनारायण पूजन का समय
 शुभ मुहूर्त = 05ः56 से 12ः20 तक।
मुहूर्त की अवधि = 6 घंटा 23 मिनट

-ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार इस दिन नए स्वर्ण आभूषण धारण करने वाली विवाहित स्त्री अखण्ड सौभाग्यवती होतो है। इस तिथि का सर्वसिद्धि मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उद्घाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। 

18जी अप्रैल 2018, बुधवार 05ः56 से 25ः29़ तक।
05ः56 से 25ः29़ बजे के मध्य चौघड़िया मुहूर्त:
प्रातः मुहूर्त (लाभ, अमृत) = 05ः57 दृ 09ः09
प्रातः मुहूर्त (शुभ) = 10ः45 दृ 12ः21
दोपहर मुहूर्त (चर, लाभ) = 15ः33 दृ 18ः45
सायं मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर) = 20ः08 दृ 24ः20
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की  इस बार अक्षय तृतीया 2018 पर लगभग 11 साल सर्वसिद्धि योग बन रहा है। इस महायोग के कारण सिंह और वृश्चिक राशि के लोगों को धन का लाभ हो सकता है। इस राशि के लोगों को आखा तीज पर कोई शुभ समाचार मिल सकता है। आप किसी वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने जा सकते हैं। मां लक्ष्घ्मी के पूजन के लिए ये दिन बहुत शुभ होता है और आप इस दिन कोई वाहन या नया मकान आदि खरीद सकते हैं।मान्घ्यता है कि इन दिनों पर सूर्य और चंद्रमा की चमक बढ़ जाती है।हिंदू मुहूर्त में चौत्र शुक्घ्ल पक्ष की प्रथम तिथि, अश्विन मास की दसवीं तिथि, वैशाख मास की तीसरी तिथि, कार्तिक मास के शुक्घ्ल पक्ष की प्रथम तिथि को शुभ माना जाता है। मान्घ्यता है कि इन दिनों पर सूर्य और चंद्रमा की चमक बढ़ जाती है। सोमवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में अक्षय तृतीया आने पर इसकी शुभता और भी ज्घ्यादा बढ़ जाती है।

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16 Apr, 2018 Blog

Astromitram : जानिए कैसे मनाएँ अक्षय तृतीया / Akshya Tratiya Kaise Manayen

जानिए कैसे मनाएँ अक्षय तृतीया

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री बताते हैं की अक्षय तृतीया कई मायनों में महत्‍वपूर्ण है। माना जाता है कि इस दिन किसी भी कार्य की शुरूआत की जा सकती है। जिनके काम काफी समय से अटके हुए हैं,  व्‍यापार में लगातार नुकसान हो रहा है अथवा किसी कार्य के लिए कोई शुभ मुहूर्त नहीं मिल पा रहा है तो अक्षय तृतीया का दिन किसी भी नई शुरूआत के लिए अत्‍यंत ही शुभ दिन है। अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदना बहुत शुभ माना गया है। इस दिन स्वर्ण आभूषणों की खरीद-फरोख्त को भाग्य की शुभता से जोड़ा जाता है।हिंदू शास्‍त्र में अक्षय तृतीया का बड़ा महत्‍व है। इस दिन को सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। इसे अखतीज और वैशाख तीज भी कहा जाता है। अक्षय तृतीया पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है। 

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14 Apr, 2018 Blog

Astromitram : Benefits of Shri Yantra / श्री यंत्र के लाभ

सिद्ध श्री यंत्र ही देता है फल

श्रीयंत्र से जुड़ी पिछली कड़ियों हम आपको उनकी स्थापना के शुभ दिन, और उन्हें सिद्ध करने के उपाय बता चुके हैं... अब आपको बताते हैं कि सिद्ध श्रीयंत्र की स्थापना करना ही क्यों अनिवार्य है और वो क्या फल देता है... 
आज का विषय बेहद महत्वपूर्ण है..क्योंकि आजकल बाजारों में रत्नों से बने श्री यंत्र आसानी से मिल जाते है..लेकिन वह सिद्ध नहीं होते....सिद्ध श्री यंत्र को विधिपूर्वक हवन-पूजन करके देवी-देवताओं को प्रतिष्ठित किया जाता है...तब बनता है सिद्ध यंत्र...जो समृद्धि देता है...याद रखिए यह जरूरी नहीं है  कि श्री यंत्र रत्नों का बना है तो ये आपके लिए फलदायी होगा....श्री यंत्र तांबे पर बना हो या भोज पत्र पर जब तक उसमें मंत्र शक्ति विधिपूर्वक प्रवाहित नहीं की जाती...तब तक वह धन प्रदान करने वाला सिद्ध यंत्र नहीं होता....
इसे आप श्री यंत्र की एक पौराणिक कथा से सरलता से समझ सकते है....श्री यंत्र के संदर्भ में एक कथा का वर्णन मिलता है....जिसके अनुसार एक बार आदि शंकराचार्यजी ने कैलाश मान सरोवर पर भगवान शिव को कठिन तपस्या कर प्रसन्न कर दिया...तपस्या से प्रसन्न भगवान शंकर ने आदि शंकराचार्य से वर मांगने को कहा...वर के रूप में आदि शंकराचार्य ने भोलेनाथ से विश्व कल्याण का उपाय मांगा....आदि शंकराचार्य का वर देते हुए भगवान शंकर ने शंकराचार्य को साक्षात लक्ष्मी स्वरूप श्री यंत्र की महिमा बताई और कहा कि यह श्री यंत्र मनुष्यों का सर्वथा कल्याण करेगा...तब से जो भी मनुष्य विधिपूर्वक सिद्ध श्रीयंत्र की स्थापना करता उसकी दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की होती है 
आज की भागती दौड़ती जिंदगी मनुष्य अनेक समस्याओं से घिरा...कोई ठप पड़े व्यवसाय से परेशान है, तो कोई हर दिन आर्थिक परेशानी को झेल रहा है...लेकिन ऐसे मनुष्यों के लिए इन समस्याओं में रामबाण सिद्ध हो सकता है श्रीयंत्र....इसके लिए उसे इस यंत्र को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ अपने व्यवसाय,  दुकान,  ऑफिस,  फैक्टरी आदि में स्थापित करना चाहिए...प्रतिदिन भक्तिभाव से इसकी पूजा करने से श्रीलक्ष्मी प्रसन्न होती है...और साधक को धन और सुख की प्रात्ति होती है...
अब आपको बताते है ऐसे कुछ खास बातें जो श्रीयंत्र से मिलने वाले लाभ को और भी ज्यादा प्रभावी बनाती है...
1. जो साधक अपने जीवन में ऐश्वर्य एवं लक्ष्मी प्राप्त करना चाहता है, उसे श्री यंत्र के सम्मुख श्री सूक्त का पाठ करें...और पंचमेवा देवी को भोग लगाए तो साधक को शीघ्र ही इसका फल प्राप्त होता है।
2. श्रीयंत्र को तिजोरी में रखने से भी आपको इसके अच्छे परिणाम की प्राप्ति होगी....व्यापार वृद्धि के लिए आप इसे तिजोरी में रखे...आपको निश्चय की धन लाभ होगा...
3. श्री यंत्र की वेलवृक्ष की छाया में उपासना करने से लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती है...और साधक को अचल सम्पत्ति प्रदान करती हैं...
4. इस यंत्र के सामने रखकर सूखे वेलपत्र घी में डुबोकर वेल की समिधा में आहूति डालने से मां भगवती शीघ्र ही प्रसन्न होती है...एवं धन ऐश्वर्य प्राप्त होता है और जीवन भर लक्ष्मी के लिए दुखी नहीं होना पड़ता..
5. मान्यता है कि भोजपत्र की अपेक्षा तांबे पर बने श्रीयंत्र का फल सौ गुना,  चांदी में लाख गुना और सोने पर निर्मित श्रीयंत्र का फल करोड़ गुना होता है
6. दीपावली की रात गृहस्थ के लिए श्री यंत्र सिद्ध करना सबसे आसान होता है...इसके लिए साधक को लक्ष्मी पूजन के बाद लक्ष्मी मंत्र - ॐ श्रीं ह््रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह््रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः की 11 माला का जाप करें...और श्री यंत्र की स्थापना कर उसका पूजन करें तो वह सिद्ध हो जाएगा...और आपके घर को धन और ऐश्वर्य से संपन्न कर देगा...
किस धातु का यंत्र कितना लाभदायक
अब आपको बताते है कि किस धातु का यंत्र कितना लाभदायक है,....‘रत्नसागर‘ में रत्नों पर श्रीयंत्र बनाने की बात लिखी गई है... इनमें स्फटिक पर बने श्रीयंत्र को सबसे अच्छा बताया गया है...विद्वानों के अनुसार भोजपत्र पर 6 वर्ष तक, तांबे पर 12 वर्ष तक, चांदी में 20 वर्ष तक और सोना धातु में श्रीयंत्र आजीवन प्रभावी रहता है...
केसर की स्याही से अनार की कलम द्वारा भोजपत्र पर श्रीयंत्र बनाया जाना चाहिए..धातु पर निर्मित श्रीयंत्र की रेखाएं यदि खोदकर बनाई गई हों और गहरी हों, तो उनमें चंदन, कुमकुम आदि भरकर पूजन करना चाहिए...
श्रीयंत्र की स्थापना करके आप भी अपने घर और व्यवसाय को धन धान्य से भर सकते है...

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14 Apr, 2018 Blog

Astromitram : Use Shri Yantra & Be Rich / श्री यंत्र का उपयोग कर बनें धनवान

श्रीयंत्र के महत्व और उसकी स्थापना विधि को समझना जितना जरूरी है उतना ही आवश्यक इस यंत्र के उपयोग को जानना भी है... यन्त्र शास्त्र के अनुसार श्रीयंत्र लक्ष्मी को आकर्षित करने वाला प्रभावी  यंत्र है. श्रीयंत्र के माध्यम से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं. आजकल हर व्यक्ति श्रीयंत्र लेना चाहता है...  बेचने वालों की भी कमी नहीं है. पर सवाल ये है कि क्या एक श्री यन्त्र रखने मात्र से काम बन जाते हैं. क्या आप जानते है कि इसका उपयोग कैसे करना चाहिए... 
यन्त्र शास्त्र विज्ञानं में हर कार्य के लिए यंत्रो का निर्माण किया जाता है. इसके अलावा भी बहुत सारे यन्त्र होते हैं जैसे कुबेर यन्त्र, व्यापार यन्त्र। लेकिन श्री यन्त्र को सबसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है इसीलिए इसे यन्त्र राज कहा जाता है. पहले इसकी रचना समझते है.  श्रीयंत्र के उपयोग को जानने से पहले इसकी रचना को समझना आवश्यक है| 

श्री यन्त्र की रचना पांच त्रिकोणों से होती है... जिसमें 43 त्रिकोण द्वारा होती है. इन त्रिकोणों को दो कमल घेरे हुए होते हैं, पहला कमल अष्टदल का होता है और दूसरा बाहरी कमल षोडशदल का होता है. इन दो कमलों के बाहर तीन वृत हैं इसके बाहर तीन चौरस होते हैं जिन्हें भूपुर कहते हैं. इस यंत्र को तांबे, चांदी या सोने पर बनाया जा सकता है. स्फटिक के श्री यन्त्र भी आजकल उपलब्ध है|

लेकिन कोई भी श्रीयंत्र खरीदने या अपने घर स्थापित करने से पहले उस यंत्र की सत्यता जान लेना जरूरी है... धर्म से जुड़ी किसी भी दुकान से श्रीयंत्र खरीद लेना बहुत आसान है.. और अब तो श्रीयंत्र ऑनलाइन बुक करवा कर उसकी होम डिलिवरी भी करवा ली जाती है... यानि 24 घंटे में आप कभी भी अपने घर श्री यंत्र लेकर आ सकते हैं... लेकिन घर में श्रीयंत्र स्थापित करने का ये सही तरीका नहीं है... श्रीयंत्र को खरीदने से पहले शुभ मुहुर्त का ध्यान रखना भी आवश्यक है... अर्थात श्रीयंत्र घर तक आए तो शुभ मुहुर्त में आए... उससे पहले ये निश्चिंतता भी की जानी जरूरी है कि बेचने वाले ने इस यंत्र को आप तक सिद्ध करने के बाद ही पहुंचाया है... और अगर ऐसा नहीं है तो श्रीयंत्र पूर्ण प्रभाव नहीं दे सकता है... क्योंकि मंत्रों के द्वारा श्रीयंत्र में जान डालना और सिद्ध करना भी आवश्यक है...
अब सवाल ये है कि क्या ये सब जाने बगैर आप श्रीयंत्र खरीद चुके हैं... उसे स्थापित भी कर चुके हैं लेकिन अब तक शुभ फल मिलना शुरू नहीं हुए... तो कुछ उपाय कर आप भी श्रीयंत्र का लाभ ले सकते हैं... इसके लिए शुक्ल पक्ष का शुक्रवार श्रेष्ठ दिन है... इस दिन श्रीयंत्र को गंगाजल से धो लें.. और अपने मंदिर में रख कर माता लक्ष्मी का ध्यान करें और ओम श्री मंत्र का जाप करें... कम से कम 21 बार इस मंत्र का जाप करें... पांच दिन तक ये क्रम बना कर रकें... उसके बाद ही ये यंत्र सिद्ध होता है... पर सबसे बेहतर ये होगा कि यंत्र सिद्धि के लिए आप किसी जानकार की मदद लें|

उसके बाद यंत्र को अपने मंदिर में स्थापित करे या जहा भी आप चाहते है दुकान या ऑफिस में रख दे. नित्य इन मंत्रो से श्री यंत्र की पूजा करें|

श्री महालक्ष्म्यै नमः

’ श्री ह््रीं क्लीं ह््रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

’ श्रीं ह््रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह््रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
 इन तीनों मंत्रों को न पढ़ सकें तो किसी एक मन्त्र का जाप करना भी पर्याप्त होगा... याद रखें कि श्री यन्त्र की जितनी पूजा होती है उतना ही बल मिलता है.

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13 Apr, 2018 Blog

Astromitram : Shree Yantra Sthapna / कैसे करें श्री यंत्र स्थापना

श्रीयंत्र से जुड़ी एस्ट्रो मित्रम की पिछली कड़ी में हमने आपको बताया श्रीयंत्र की स्थापना के लिए कौन सा दिन शुभ है... अब आपको बताते हैं कि श्रीयंत्र की स्थापना कैसे करें... 

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार लक्ष्मी यं‍त्र या श्रीयंत्र को चावल की ढेरी पर स्था,पित कर उत्तर की तरफ मुख करें..  कमल गट्टे की माला, गुलाबी आसन, खीर का नैवेद्य, गुलाब का इत्र, कमल या गुलाब पुष्प से पूजन कर दिए गए मंत्र का यथाशक्ति जप करें। ये मंत्र हैं...
* 'ॐ श्रीं श्रियै नम:।।'
* 'ॐ कमल वासिन्यै श्रीं श्रियै नम:।।'
* 'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं श्रियै नम:।।'

इन मंत्रों के जाप के साथ यंत्र को छोड़ कर सभी सामग्री पोटली बनाकर या गल्ले-तिजोरी में रख दें।

ब्रह्म मुहूर्त में इस प्रयोग को करें। सौभाग्यवती स्त्रियों को इस दिन व्रत करने पर अखंड सौभाग्य तथा अक्षय संतान की प्राप्ति होती है। अक्षय तृतीया पर श्री महालक्ष्मी का ध्यान करें... श्री मंत्र का चप करें और एक मुठ्ठी बासमती चावल बहते हुए प्रवाह कर दें।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की श्री यन्त्र की स्थापना और पूजन योग्य और जानकार व्यक्ति से ही करवाएं... उसके बाद यंत्र को अपने मंदिर में स्थापित करें या जहां भी आप चाहतें हैं दुकान या ऑफिस में रख दें। बताए हुए तीनों मंत्रों के साथ श्री यंत्र की पूजा कर सकते हैं। 

ध्यान रहे श्री यन्त्र की जितनी पूजा होती है उतना ही बल मिलता है। श्री यंत्र मंत्र श्री महालक्ष्म्यै नमः श्री ह्रीं क्लीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः, श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद, श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः!

लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है।

मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।
श्री यंत्र का निर्माण सिद्ध मुहूर्त में ही किया जाता है। गुरुपुष्य योग, रविपुष्य योग, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, शिवरात्रि, अक्षय तृतीया आदि श्रीयंत्र निर्माण और स्थापन के श्रेष्ठ मुहूर्त हैं। शुभ अवसरों पर श्री यंत्र की पूजा का विधान है। 

श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण और पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है

सर्वाधिक रहस्यमय श्रीविद्या के यंत्र स्वरूप को ‘श्रीयंत्र’ या ‘श्रीचक्र’ कहते हैं। यह एक मात्र ऐसा यंत्र है, जो समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है। श्री शब्द का अर्थ लक्ष्मी, सरस्वती, शोभा, संपदा, विभूति से किया जाता है। यह यंत्र ‘श्री विद्या’ से संबंध रखता है। साधक को लक्ष्मी़, संपदा, विद्या आदि की ‘श्री’ देने वाली विद्या को ही ‘श्रीविद्या’ कहा जाता है। श्रीयंत्र को यंत्रराज भी कहा जाता है, इसे यंत्रों में सर्वोत्तम माना गया है। कलियुग में कामधेनु के समान ही है जो साधक को पूर्ण मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान करता है। श्री यंत्र को कल्पवृक्ष भी कहा गया है, जिसके सान्निध्य में सारी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

श्री विद्या के यंत्र को 'श्रीयंत्र' कहते हैं या 'श्रीचक्र' कहते हैं। यह अकेला ऐसा यंत्र है, जो समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है। श्री शब्द का अर्थ लक्ष्मी, सरस्वती, शोभा, संपदा, विभूति से किया जाता है। यह यंत्र श्री विद्या से संबंध रखता है। श्री विद्या का अर्थ साधक को लक्ष्मी़, संपदा, विद्या आदि हर प्रकार की 'श्री' देने वाली विद्या को कहा जाता है।

यह परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महात्रिपुर सुंदरी का आराधना स्थल है। यह चक्र ही उनका निवास एवं रथ है। यह ऐसा समर्थ यंत्र है कि इसमें समस्त देवों की आराधना-उपासना की जा सकती है। सभी वर्ण संप्रदाय का मान्य एवं आराध्य है। यह यंत्र हर प्रकार से श्री प्रदान करता है जैसा कि दुर्गा सप्तशती में कहा गया है-

आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा

इस मंत्र के जाप से आदिशक्ति मनुष्यों को सुख, भोग, स्वर्ग, अपवर्ग देने वाली होती है। उपासना सिद्ध होने पर सभी प्रकार की 'श्री' अर्थात चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति हो सकती है। इसील‍िए इसे 'श्रीयंत्र' कहते हैं। वामकेश्वर तंत्र में कहा है-

सर्वदेव मयी विद्या

दुर्गा सप्तशती में- 

विद्यासि सा भगवती परमा‍हि देवि।

हे देवी! तुम ही परम विद्या हो।


नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। इस प्रकार इस यंत्र में 43 त्रिकोण, 28 मर्म स्थान, 24 संधियां बनती हैं। तीन रेखा के मिलन स्थल को मर्म और दो रेखाओं के मिलन स्थल को संधि कहा जाता है।

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13 Apr, 2018 Blog

Astromitram : Importance of Shree Yantra in Home / श्री यंत्र की स्थापना का महत्व

Astromitram की इस कड़ी में आपको बताएंगे घर में श्रीयंत्र स्थापित करने का महत्व क्या है... श्रीयंत्र एक सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है, इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है, इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया घर में इस यंत्र को स्थापित करना बेहद शुभ माना जाता है... क्योंकि ये सुख समृद्धि लेकर आता है... श्री यंत्र की स्थापना से पहले ये जानना भी जरूरी है कि श्रीयंत्र को घर में कब स्थापित किया जाए... श्रीयंत्र को स्थापित करने का सबसे श्रेष्ठ दिन है अक्षय तृतीया...
अक्षय तृतीया के दिरन घर में श्री यंत्र की स्था पना भी धन की परेशानी दूर करने के लिरए फायदेमंद है। पारद के लक्ष्मी नारायण की स्था.पना भी अक्षय तृतीया के दिीन कर सकते हैं। लक्ष्मी के हा‌थ में स्िंदात दक्षिरणवर्ती शंख भी धन दायक माना गया है। आप इसे इस दिन अपने घर ला सकते हैं।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हमारे शास्त्रों मे भी कहा गया है कि यदि लक्ष्मी जी, विष्णु जी के साथ मनुष्य के घर में स्थायी रूप से निवास करें, तो व्यक्ति के जीवन में किसी भी वस्तु तथा भौतिक सुखों का अभाव हो ही नही सकता। हमारे शास्त्रों में इस लिये इस दिन विशेष रूप से ‘श्री यंत्र’ जो कि माँ लक्ष्मी जी का आधार एवं मनुष्य को जीवन में हर प्रकार का भौतिक सुख और ऐश्वर्य देने वाला है तथा दरिद्रता को जीवन से दूर करने वाला है, इस श्री यंत्र की घर में स्थापना विधान बतलाया गया है।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार स्वयं गुरू गोरखनाथ जी ने भी एक स्थान पर कहा है भले ही अन्य सारे प्रयोग असफल हो जाएँ, भले ही साधक नया हो, भले ही उसे स्पष्ट मंत्रो के उच्चारण का ज्ञान न हो, परन्तु अक्षय तृतिया के अवसर पर इनको सफलता अवश्य मिलती है। इस पर्व की पूर्णता के बारे में स्पष्ट करते हुये यहाँ तक कहा गया है कि कोई अभागा ही होगा जो इस पावन अवसर को गवायेगा। जिसके भाग्य में दरिद्रता ही लिखी हुई हो, वही ऐसा अवसर चूकेगा। अतः इस मुहूर्त का उपयोग करके व्यक्ति अपने दरिद्रता, अभाव, परेशानियों को हमेशा के लिये अपने जीवन से कोसों दूर भगा सकता है और उसके स्थान पर सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य व उन्नति को प्राप्त करता है। अक्षय तृतीया वाले दिन स्वर्ण-मुद्रा व स्वर्ण आभूषण खरीदने की भी प्रथा है, यह मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य के जीवन व घर-परिवार में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्यता आती है।

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