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13 Apr, 2018 Blog

Astromitram : Shree Yantra Sthapna / कैसे करें श्री यंत्र स्थापना

श्रीयंत्र से जुड़ी एस्ट्रो मित्रम की पिछली कड़ी में हमने आपको बताया श्रीयंत्र की स्थापना के लिए कौन सा दिन शुभ है... अब आपको बताते हैं कि श्रीयंत्र की स्थापना कैसे करें... 

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार लक्ष्मी यं‍त्र या श्रीयंत्र को चावल की ढेरी पर स्था,पित कर उत्तर की तरफ मुख करें..  कमल गट्टे की माला, गुलाबी आसन, खीर का नैवेद्य, गुलाब का इत्र, कमल या गुलाब पुष्प से पूजन कर दिए गए मंत्र का यथाशक्ति जप करें। ये मंत्र हैं...
* 'ॐ श्रीं श्रियै नम:।।'
* 'ॐ कमल वासिन्यै श्रीं श्रियै नम:।।'
* 'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं श्रियै नम:।।'

इन मंत्रों के जाप के साथ यंत्र को छोड़ कर सभी सामग्री पोटली बनाकर या गल्ले-तिजोरी में रख दें।

ब्रह्म मुहूर्त में इस प्रयोग को करें। सौभाग्यवती स्त्रियों को इस दिन व्रत करने पर अखंड सौभाग्य तथा अक्षय संतान की प्राप्ति होती है। अक्षय तृतीया पर श्री महालक्ष्मी का ध्यान करें... श्री मंत्र का चप करें और एक मुठ्ठी बासमती चावल बहते हुए प्रवाह कर दें।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की श्री यन्त्र की स्थापना और पूजन योग्य और जानकार व्यक्ति से ही करवाएं... उसके बाद यंत्र को अपने मंदिर में स्थापित करें या जहां भी आप चाहतें हैं दुकान या ऑफिस में रख दें। बताए हुए तीनों मंत्रों के साथ श्री यंत्र की पूजा कर सकते हैं। 

ध्यान रहे श्री यन्त्र की जितनी पूजा होती है उतना ही बल मिलता है। श्री यंत्र मंत्र श्री महालक्ष्म्यै नमः श्री ह्रीं क्लीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः, श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद, श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः!

लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है।

मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।
श्री यंत्र का निर्माण सिद्ध मुहूर्त में ही किया जाता है। गुरुपुष्य योग, रविपुष्य योग, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, शिवरात्रि, अक्षय तृतीया आदि श्रीयंत्र निर्माण और स्थापन के श्रेष्ठ मुहूर्त हैं। शुभ अवसरों पर श्री यंत्र की पूजा का विधान है। 

श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण और पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है

सर्वाधिक रहस्यमय श्रीविद्या के यंत्र स्वरूप को ‘श्रीयंत्र’ या ‘श्रीचक्र’ कहते हैं। यह एक मात्र ऐसा यंत्र है, जो समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है। श्री शब्द का अर्थ लक्ष्मी, सरस्वती, शोभा, संपदा, विभूति से किया जाता है। यह यंत्र ‘श्री विद्या’ से संबंध रखता है। साधक को लक्ष्मी़, संपदा, विद्या आदि की ‘श्री’ देने वाली विद्या को ही ‘श्रीविद्या’ कहा जाता है। श्रीयंत्र को यंत्रराज भी कहा जाता है, इसे यंत्रों में सर्वोत्तम माना गया है। कलियुग में कामधेनु के समान ही है जो साधक को पूर्ण मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान करता है। श्री यंत्र को कल्पवृक्ष भी कहा गया है, जिसके सान्निध्य में सारी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

श्री विद्या के यंत्र को 'श्रीयंत्र' कहते हैं या 'श्रीचक्र' कहते हैं। यह अकेला ऐसा यंत्र है, जो समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है। श्री शब्द का अर्थ लक्ष्मी, सरस्वती, शोभा, संपदा, विभूति से किया जाता है। यह यंत्र श्री विद्या से संबंध रखता है। श्री विद्या का अर्थ साधक को लक्ष्मी़, संपदा, विद्या आदि हर प्रकार की 'श्री' देने वाली विद्या को कहा जाता है।

यह परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महात्रिपुर सुंदरी का आराधना स्थल है। यह चक्र ही उनका निवास एवं रथ है। यह ऐसा समर्थ यंत्र है कि इसमें समस्त देवों की आराधना-उपासना की जा सकती है। सभी वर्ण संप्रदाय का मान्य एवं आराध्य है। यह यंत्र हर प्रकार से श्री प्रदान करता है जैसा कि दुर्गा सप्तशती में कहा गया है-

आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा

इस मंत्र के जाप से आदिशक्ति मनुष्यों को सुख, भोग, स्वर्ग, अपवर्ग देने वाली होती है। उपासना सिद्ध होने पर सभी प्रकार की 'श्री' अर्थात चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति हो सकती है। इसील‍िए इसे 'श्रीयंत्र' कहते हैं। वामकेश्वर तंत्र में कहा है-

सर्वदेव मयी विद्या

दुर्गा सप्तशती में- 

विद्यासि सा भगवती परमा‍हि देवि।

हे देवी! तुम ही परम विद्या हो।


नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। इस प्रकार इस यंत्र में 43 त्रिकोण, 28 मर्म स्थान, 24 संधियां बनती हैं। तीन रेखा के मिलन स्थल को मर्म और दो रेखाओं के मिलन स्थल को संधि कहा जाता है।

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