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15 Nov, 2018 Blog

Kya Hai 108 Ank Ka Rahasya / क्या है 108 अंक का रहस्य

https://youtu.be/wlfr45U47tA

क्या है 108 अंक का रहस्य

108 एक ऐसा अंक है जो हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसे शिव का अंक भी माना गया है। 
रूद्राक्ष की माला हो या फिर मंत्रों का जाप, दोनों में एक चीज बेहद सामान्य है और वह है 108 का अंक। ईश्व्र का नाम भी तभी संपूर्ण होता है जब वह 108 बार बोला गया हो। हिंदू धर्म में 3 के अंक को बिल्कुमल भी शुभ नहीं मानते लेकिन वहीं इसके उलट 108 के अंक को बेहद शुभ मानते हैं।

॥ॐ॥ का जप करते समय १०8 प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है, जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास का प्रबल कारण है।

॥ 108 ॥
यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय काल से हमारे ऋषि -मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है। 

संख्या 108 का रहस्य 
अ→१ ... आ→२ ... इ→३ ... ई→४ ... उ→५ ... ऊ→६. ... ए→७ ... ऐ→८ ओ→९ ... औ→१० ... ऋ→११ ... लृ→१२
अं→१३ ... अ:→१४.. ऋॄ →१५.. लॄ →१६

क→१ ... ख→२ ... ग→३ ... घ→४ ...
ङ→५ ... च→६ ... छ→७ ... ज→८ ...
झ→९ ... ञ→१० ... ट→११ ... ठ→१२ ...
ड→१३ ... ढ→१४ ... ण→१५ ... त→१६ ...
थ→१७ ... द→१८ ... ध→१९ ... न→२० ...
प→२१ ... फ→२२ ... ब→२३ ... भ→२४ ...
म→२५ ... य→२६ ... र→२७ ... ल→२८ ...
व→२९ ... श→३० ... ष→३१ ... स→३२ ...
ह→३३ ... क्ष→३४ ... त्र→३५ ... ज्ञ→३६ ...
ड़ ... ढ़ ...

ओ अहं = ब्रह्म 
ब्रह्म = ब+र+ह+म =२३+२७+३३+२५=१०८

1. यह मात्रिकाएं (१८स्वर +३६व्यंजन=५४) नाभि से आरंभ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे 108 की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार 108 मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की 108 सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। जितना हो सके उतना करना ठीक होता है, लेकिन नित्य कम से कम 108 मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।।

2. मनुष्य शरीर की ऊंचाई
= यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि
= (4 ऊंगुलियों) का २7 गुणा होती है।
= 4 × 27 = 108

3. नक्षत्रों की कुल संख्या = 27
प्रत्येक नक्षत्र के चरण = 4
जप की विशिष्ट संख्या = 108
अर्थात ॐ मंत्र जप कम से कम 108 बार करना चाहिये ।

4.  पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास=108
पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास=108
यानि की मंत्र जप 108 से कम नहीं करना चाहिए।

5. हिंसात्मक पापों की संख्या 36 मानी गई है जो मन, वचन व कर्म 3 प्रकार से होते है। यानि की 36×3=108। पाप कर्म संस्कार निवृत्ति के लिए किए गए मंत्र जप को कम से कम 108 जरूर ही करना चाहिए।

6. 24 घंटे में एक व्यक्ति २१६०० बार सांस लेता है। दिन-रात के २४ घंटों में से १२ घंटे सोने व गृहस्थ कर्त्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और बाकी 12 घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है १०८०० बार। इस समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । इसीलिए १०८०० की इसी संख्या के आधार पर जप के लिए 108 की संख्या निर्धारित करते हैं।

7. एक वर्ष में सूर्य २१६०० कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह दक्षिणायन में यान कि सूर्य छः माह की एक स्थिति में १०८००० बार कलाएं बदलता है।

8. 786 का भी पक्का जबाब — ॥ १०८ ॥

9. ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम - मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। ग्रहों की संख्या 9 में राशियों की संख्या 12 से गुणा करें तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है।

10.  108 में तीन अंक हैं, 1+0+8, इनमें एक '1' ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर का एक सत्ता है अर्थात ईश्वर १ है और मन भी एक है।  शून्य '0' प्रकृति को दर्शाता है। आठ '8'
जीवात्मा को दर्शाता है क्योंकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर '1' का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति '0' में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति '0' को, यानि की जो की जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा या कहे शून्य नहीं करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव '8' ईश्वर '1' से नहीं मिल पायेगा । पूर्णता (1+8=9) को नहीं प्राप्त कर पायेगा । 
9पूर्णता का सूचक है।

11. 

१- ईश्वर और मन
२- द्वैत, दुनिया, संसार
३- गुण प्रकृति (माया)
४- अवस्था भेद (वर्ण)
५- इन्द्रियाँ
६- विकार
७- सप्तऋषि, सप्तसोपान
८- आष्टांग योग
९- नवधा भक्ति (पूर्णता)

12. वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार
अहंकार के गुण = २
बुद्धि के गुण = ३
मन के गुण = ४
आकाश के गुण = ५
वायु के गुण = ६
अग्नि के गुण = ७
जल के गुण = ८
पॄथ्वी के गुण = ९
२+३+४+५+६+७+८+९ =
प्रकॄति के कुल गुण = ४४
जीव के गुण = १०
इस प्रकार संख्या का योग = ५४
अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = ५४
एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = ५४
दोंनों संख्याओं का योग = १०८

13.
संख्या '1' एक ईश्वर का संकेत है।
संख्या '0' जड़ प्रकृति का संकेत है।
संख्या '8' बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है।
यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ।
यही पवित्र त्रेतवाद है ।
संख्या '2' से '9' तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में '0' रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिए अगर '0' ना हो तो कोई क्रम गणना नहीं हो सकती। '1' की चेतना से '8' का खेल । '8' यानि '2' से '9' । यह '8' क्या है ? मन के '8' वर्ग या भाव । ये आठ भाव ये हैं - १. काम- इच्छाएं / वासनाएं  । 
२. क्रोध । 
३. लोभ ।
४. मोह । 
५. मद ( घमण्ड ) 
६. मत्सर ( जलन ) 
७. ज्ञान ।
८. वैराग ।
14. सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें ।

इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ वसुओं से टक्कर होती हैं। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ वसुओं की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के  72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड मंध निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है।

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